दीपक राग...
पतंगा परवाना दीवाना ,
क्या प्रदर्शित करता है, तुम्हारा -
यूं जल जाना ?
दीपक कहाँ -
प्रीति की रीति को पहचानता है !
क्या व्यर्थ नहीं है ,
तुम्हारा यूं छला जाना ?
अर्ध मूर्छित परवाना तडफडाया ,
बेखुदी में यूं बड़बड़ाया ;
अरे दुनिया वालो -
यही तो सच्चा प्यार है,
प्यार के बिना तो जीना बेकार है |
शमा, बुलाये तो सही,
मुस्कुराए तो सही,
परवाना तो एक नज़र पर -
मिटने को तैयार है |
इसीलिये अमर-प्रेम पर,
शमा-परवाना का अधिकार है ||
दीपशिखा झिलमिलाई ,
लहराकर खिलखिलाई |
दुनिया वाले व्यर्थ शंका करते हैं ,
प्यार करने वाले-
जलने से कहाँ डरते हैं |
पतंगों के प्यार में ही तो हम -
तिल तिल कर जलते हैं |
वे मर मर कर जीते हैं ,
जल जल कर मरते हैं |
हम तो पिघल पिघल कर ,
आखिरी सांस तक,
आंसू बहाते हैं |
पतंगे की किस्मत में-
ये पल कहाँ आते हैं ?