नाग गले में लिपटे रहते,
चन्दा माथे पर जिनके।
जटाजूट में गंगा बहती,
है त्रिशूल कर में उनके।
नेत्र तीसरा है मस्तक पर,
नीला कंठ सुहाया है ।
कटि पर बस मृगछाला बांधे,
तन पर भष्म रमाया है ।
बच्चो! ये भोले शंकर हैं,
शिव-शंभू भी कहलाते ।
देवों के भी देव हैं इससे,
महादेव बोले जाते ।
अर्थ ये लिपटे नागों का है,
दुष्टों को बस में करते ।
फिर भी शीतल रहे ह्रदय, वे-
चन्दा माथे पर रखते ।
जग के कष्टों का विष पीकर,
नीलकंठ बन जाते हैं ।
सत तम रज का त्रिशूल थामे,
प्रेम की गंगा बहाते हैं ।।
चन्दा माथे पर जिनके।
जटाजूट में गंगा बहती,
है त्रिशूल कर में उनके।
नेत्र तीसरा है मस्तक पर,
नीला कंठ सुहाया है ।
कटि पर बस मृगछाला बांधे,
तन पर भष्म रमाया है ।
बच्चो! ये भोले शंकर हैं,
शिव-शंभू भी कहलाते ।
देवों के भी देव हैं इससे,
महादेव बोले जाते ।
अर्थ ये लिपटे नागों का है,
दुष्टों को बस में करते ।
फिर भी शीतल रहे ह्रदय, वे-
चन्दा माथे पर रखते ।
जग के कष्टों का विष पीकर,
नीलकंठ बन जाते हैं ।
सत तम रज का त्रिशूल थामे,
प्रेम की गंगा बहाते हैं ।।