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गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

दो मिनट मंदिरों के लिए... सुगना फाउंडेशन

निवेदन है कि हमे सुबह और सायंकाल आरती के वक्त जो भी मंदिर पास हो वहाँ पहुंचना चाहिए. कुछ मंदिर हैं देश में जहां लोग घण्टों दर्शन के लिए खड़े रहते हैं, पर हमारे आस पास के मंदिरों की बात करें तो हालात बहुत बुरे है. वहाँ आरती के वक्त झालर, शंख, नगाड़ा बजाने को लोग नहीं होते है. कुछ लोगों ने इसका तोड़ निकाला है, इलेक्ट्रिक मशीनें ले आये हैं.
          यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है ?
कोई इसपर विचार नहीं करता. कहने को हम करोड़ों हैं, पर मंदिरों में आरती के वक्त 4 लोग नहीं पहुँच पाते. इसी कारण मोहल्ले वाले भी एक दूसरे को पहचान नहीं पाते और हिंदुओं में एकता नहीं हो पाती है.

           इस पर विचार होना चाहिए.
मंदिर ही हैं जो हमें एक दूसरे से जोड़ने में सहायक हो सकते हैं ।।

आओ प्रयत्न करे अपने व्यस्त समय में से कुछ समय धर्म की रक्षा राष्ट्र की एकता, अखंडता अपने संस्कारो हेतु निकले ....... सुगना फाउंडेशन मेघलासिया
👏👏👏👏👏👏👏
             🙏 दो मिनट मंदिरों के लिए🙏


रविवार, 9 दिसंबर 2012

संत गुरु ज्ञान गंगा प्रतियोगिता 12/12/12 से फेसबूक पर..शेयर जरुर करे.

प्रिय मित्रो,

मुझे बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि संत गुरु ज्ञान गंगा प्रतियोगिता का आयोजन 12/12/2012 को फेसबुक पर किया जा रहा है इस प्रतियोगिता में सभी फेसबूक यूज़र हिस्सा ले सकते है! इस प्रतियोगिता का आयोजन आप राजपुरोहित हो ? तो ये पेज 'Like (लाइक) करो  http://www.facebook.com/rajpurohitpage } इस पेज किया जाएगा और इस प्रतियोगिता का आयोजक सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया हैं तो आप सभी तैयार हो जाए. इस प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल ज्ञान बढ़ना है आप सभी अपने विचार या सुझाव इस मेल आई डी sawaisinghraj007@gmail.com पर भेज (पोस्ट) कर सकते, आपका सहयोग नितांत रूप से आवश्यक है !

क्युकी ये तारीख है

 कुछ खास यह 100 साल में एक ही बार आएगीजी हां ये तारीख 12/12/12 है।

दिसंबर का माह बेहद खास है, इस माह में एक अद्भुत योग बन रहा है। 12 दिसंबर 12 तीन 12 एक साथ आ रहे हैं। इसके अलावा इसी दिन दिन में दो बार एक सेकंड के लिए छह 12 एक साथ आएंगे। 12 दिसंबर 12 को सुबह और रात में 12 बजकर 12 मिनट एवं 12 सेकंड यह अद्भुत योग बनेगा!



आप राजपुरोहित हो ? तो ये पेज 'Like (लाइक) करो इस पेज को अभी like करे अब इस पेज को हर कोई'Like (लाइक) कर सकता है http://www.facebook.com/rajpurohitpage } क्याकि पिछले काफी दिनों से इस पेज पर और सन्देश और ईमेल से मेरे पास बहुत से लोगो ने ये कहा की इस हम भी इस पेज को पसंद करते है एक टिप्‍पणि ये भी पढ़े श्री मनु राजपुरोहितजी ने कहा की :- "ज़रूरी नही के सिर्फ़ इस पेज को राजपुरोहित ही लाइक करे अगर श्री खेतेश्वर दाता को हर दिल पाना है तो हर वो इंसान लाइक करे चाहे वो राजपुरोहित हो या ना हो!".....धन्यवाद्! 

इस प्रतियोगिता के नियम / शर्तें हेतु विजित करे http://rajpurohitsamaj-s.blogspot.in

प्रस्तुतकर्ता : -

 सवाई आगरा , आप मुझसे जुड़ सकते हैं :- 

www.fb.com/aajkaagrapage

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक...एक रोचक पहलू


रावण के 10 सिर और श्रीराम के 1 सिर से जुड़ा एक रोचक पहलू

हिन्दू धर्म में विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि की नौ रातों में शक्ति पूजा द्वारा शक्ति संचय की भाव के साथ विजयादशमी पर श्रीराम का स्मरण किया जाता है और बुराई और अहंकार के प्रतीक रावण का दहन किया जाता है। 
राम-रावण युद्ध से जुड़ी यह मान्यता प्रचलित है कि भगवान राम ने रावण का वध कर अहंकार के अंत से ही तमाम सुख को पाने की राह दिखाई। किंतु राम और रावण के चरित्र और व्यक्तित्व को व्यावहारिक नजरिए से तुलना कर विचार करें तो रावण का अहंकार ही नहीं बल्कि उसके चरित्र की एक ओर बड़ी खामी दुर्गति का कारण बनी। 
यह दोष अगर किसी भी इंसान के चरित्र में मौजूद हो तो उसका हर गुण, योग्यता, क्षमता निरर्थक होकर असफल और दु:खी जीवन का कारण बन सकती है। इसे भगवान राम के 1 सिर व रावण के 10 सिरों पर गौर कर सोचें तो बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। तस्वीर पर क्लिक कर जानिए श्रीराम व रावण से जुड़ा एक रोचक पहलू -
दरअसल, अक्सर रावण के दस सिर चरित्र दोषों के प्रतीक माने जाते हैं। किंतु रावण के चरित्र का सकारात्मक पक्ष यह भी था कि वह वेद, शास्त्रों, अनेक कलाओं व विद्याओं के साथ ज्योतिष व कालगणना का ज्ञाता था। लिहाजा राम व रावण के व्यक्तित्व व चरित्र से जुड़ा एक दर्शन यह भी माना जाता है कि अगर राम बुद्धि संपन्न थे, तो रावण, राम से दस गुना बुद्धिमान था। बावजूद इसके वह राम के सामने परास्त हुआ। ऐसा इसलिए कि बुद्धि व ज्ञान संपन्नता के बावजूद रावण विवेक हीन था। जबकि सिर्फ एक सिर वाले राम बुद्धि के साथ विवेकवान भी थे यानी, सही और गलत, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच फर्क करने की अद्भुत क्षमता भगवान राम के पास थी, किंतु रावण के पास अभाव। 
दूसरे शब्दों में समझें तो राम का 1 सिर संकल्प का प्रतीक तो रावण को विकल्पों की उलझन का प्रतीक है। बस, राम की यही खूबी जीत का और रावण की खामी हार का कारण बनी। इस प्रसंग में सार यही है बुद्धि के साथ वक्त, हालात के मुताबिक सही और गलत को चुनने की सही निर्णय क्षमता भी सफल और सुखी जीवन के लिए अहम होती है। अन्यथा रावण की भांति दंभ, विकल्पों से भरा और विवेकहीन स्वभाव व व्यवहार जीवन में कुंठा, निराशा और असफलता लाता है।

साभार 
www.sai-ka-aangan.org

सादर
आपके सहयोग एवं स्नेह का सदैव आभरी हूँ  
आपका सवाई  सिंह राजपुरोहित

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन जी का आज 70 जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं...

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन जी का आज 70 जन्मदिवस है उनको मेरी और सम्पुण ब्लॉग परिवार & सुगना फाऊंडेशन-मेघालासिया की पूरी टीम की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं...


 
क्या आप जानते है

1 -अमिताभ से पहले उनका नाम इंकलाब राय पडने वाला था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अमरनाथ झा का दिया यह नाम उनके पिता को बहुत पसंद भी था, लेकिन सुमित्रानंदन पंत के दिए नाम अमिताभ का असर लोगों पर अधिक हुआ और उनका नाम अमिताभ बच्चन पड़ गया।

2 -कुली की शूटिंग के दौरान जब वह ब्रीचकैंडी अस्पताल में भर्ती थे, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी उन्हें देखने अस्पताल आई थीं। मुंबई पुलिस की आधा संख्या बल ब्रीचकैंडी के आसपास उस दिन तैनात किया गया था।

3-अमिताभ शाकाहारी हैं। उन्हें आलू-पूड़ी, पकौड़ा, ढोकला और पराठा बेहद पसंद है।
4- 1996 में उनकी कंपनी एबीसीएल ने मिस व‌र्ल्ड प्रतियोगिता का आयोजन भारत में करवाया। आयोजन सफल रहा, लेकिन महिला संगठनों ने संस्कृति को आधार बनाकर उनकी आलोचना भी की।
5- बिग बी दोनों हाथों से लिख सकते हैं। वह विज्ञान के साथ ही कई भाषाओं के जानकार भी हैं।

6- उन्होंने अपनी पहली नौकरी शॉ एंड वॉलेस कंपनी के साथ शुरू की थी। उन्होंने एक शिपिंग कंपनी के साथ ब्रोकर के तौर पर भी काम किया था।

7- उनकी पहली तनख्वाह 500 रुपए थी। टैक्स कटने के बाद उनके हाथ में 480 रुपए आए थे।

8- आनंद फिल्म की भूमिका के बाद उन्होंने दस फ्लॉप फिल्में दी। इस दो साल के असफल कॅरियर के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जंजीर से सफलता का सोलो स्वाद चखा।

9- पहली बार अमिताभ और जया भादुड़ी एफटीआईआई पुणे मे मिले थे, उसके बाद हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी के सेट पर मिले।

10- 1978-1979 में लगभग एक साथ उन्होंने सिगरेट, शराब और मास से तौबा कर ली। 
साभार 
देनिक जागरण 
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Dainik Jagran Hindi News
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प्रस्तुतकर्ता :- सवाई सिंह

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

मित्रो एक बार लेख को जरुर पढ़े..अखबार में छपी सूचना के अनुसार वह तस्वीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की थी

मित्रो एक बार लेख को जरुर पढ़े ...

कुछ समय पहले, फ़ेसबुक पर, बहुत से व्यक्तियों ने एक खूबसूरत महिला की तस्वीर पोस्ट की जो किसी अख़बार में छपी हुई थी। अखबार में छपी सूचना के अनुसार वह तस्वीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की थी। हमारी प्रिय और आदरणीय रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर? ज़ाहिर है कि इस तस्वीर को देखने के लिए लोग उतावले थे। लेकिन एक नज़र देखते ही मुझे पता लग गया कि यह तस्वीर झूठी है। दरअसल मुझे बहुत अजीब भी लगा कि भारतीय जनता ज़रा-सा भी कॉमन सेंस प्रयोग नहीं करती! बस किसी ने जो भी कह दिया उसे सच मान लिया। लो
ग उस तस्वीर को जो कि हर कोण से झूठी लग रही थी! बिना सोचे-समझे इंटरनेट पर फैलाए जा रहे थे। देशप्रेम की भावना ने लोगों के दिल और दिमाग पर शायद कब्ज़ा कर लिया था – लेकिन देशभक्ति के लिए अपनी बुद्धि की आंखे बंद कर लेना तो ज़रूरी नहीं है! नीचे मैं वही तस्वीर दे रहा हूँ। आप देखिए और फ़ैसला कीजिए:


अख़बार में छपी तस्वीर जिसे झांसी की रानी की तस्वीर बताया गया। यह झूठ है।
हालांकि हिन्दुस्तान में फ़ोटो स्टूडियो 1840 में भी थे (और शायद उससे पहले भी) –लेकिन यह तस्वीर बहुत अधिक “आधुनिक” लग रही है। यह मानना बेहद मुश्किल है कि उस समय महिलाएँ इस तरह के फ़ोटो खिंचवाती होंगी; और रानी लक्ष्मीबाई ने ऐसा किया होगा –ये मानना तो बहुत दूर की कौड़ी लाने जैसा होगा। इस तरह की तस्वीर रानी के निजी कक्ष में ही खींची जा सकती थी –और मुझे नहीं लगता कि उस समय की कोई भी रानी किसी भी फ़ोटोग्राफ़र को अपने निजी कक्ष में आने की अनुमति देती होगी।

इस तस्वीर में दिखने वाली महिला के हाव-भाव से ही पता चलता है कि वह कैमरे और फ़ोटोग्राफ़ी के साथ काफ़ी अभ्यस्त और सहज हो चुकी हैं। साथ ही फ़ोटोग्राफ़ी की गुणवत्ता भी रानी लक्ष्मीबाई के समय से मेल नहीं खाती। उस समय के बक्से वाले कैमरे से इतनी अच्छी तस्वीरें खींचना संभव नहीं हुआ करता था।

मेरे मूल अंग्रेज़ी लेख की एक पाठक श्रीमति चमन निगम जी ने एक रोचक टिप्पणी की थी। उन्होनें कहा कि ऊपर दिए चित्र के साथ “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली थी” पंक्ति मेल नहीं खाती -इसलिए भी यह चित्र झूठा है!

इस सारे झमेले में जो चीज़ मुझे सबसे अधिक परेशान कर रही है वो है हमारी पत्रकारिता (विशेषकर हिन्दी पत्रकरिता) का गिरता स्तर। मेरी जानकारी के मुताबिक ऊपर दी गई तस्वीर भारत के सबसे बड़े हिन्दी अख़बार दैनिक भास्कर में छपी थी। चित्र के साथ में छपी जानकारी हालांकि ठीक है लेकिन इस खबर के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति ने ग़लत तस्वीर छाप दी! शर्म आती है इस तरह की पत्रकारिता देख कर।

सो, अगर ऊपर दिया गया चित्र ग़लत है तो फिर सही चित्र कहाँ हैं? ऐसा कहा जाता है कि सन 1850 में एक ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़र ने झांसी की रानी की एक तस्वीर ली थीउस समय रानी की आयु मात्र 15 वर्ष की थी। फ़ोटोग्राफ़र ने अपना नाम “हॉफ़मैन” बताया था और कहा था कि वह जर्मन है। ऐसा उसने शायद इसलिए किया क्योंकि किसी ब्रिटिश व्यक्ति का रानी के आस-पास फटकना भी संभव नहीं था। “हॉफ़मैन” द्वारा लिया गया चित्र नीचे दिया गया है।

"हॉफ़मैन"द्वारा ली गई झांसी की रानी की तस्वीर यह तस्वीर अहमदाबाद के एक चित्रकार अमीत अम्बालाल के पास है। उन्होनें इसे 40 वर्ष पहले जयपुर से करीब डेढ़ लाख रुपए में खरीदा था। अम्बालाल ने इसे अपने फ़ोटोग्राफ़र मित्र वामन ठाकरे को दे दिया और वामन ठाकरे ने इसे भोपाल में एक प्रदर्शनी के दौरान जनता के सामने रखा। इस तरह दैनिक भास्कर की खबर बनी जिसमें ग़लत फ़ोटो को छाप दिया गया। मुझे नहीं पता कि अखबार में छपी ग़लत तस्वीर में जो महिला दिख रही हैं –वे कौन हैं। यदि किसी पाठक को पता हो तो मुझे ज़रूर बताएँ।


रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1835 को मणिकर्णिका के रूप में वाराणसी में हुआ था। बाद में उन्हें प्यार से “मनु” कह कर पुकारा जाने लगा। उनकी मृत्यु केवल 22 वर्ष की उम्र में ही हो गई। इस छोटी-सी ज़िन्दगी में ही उन्होनें आत्म रक्षा, घुड़सवारी, धनुर्विद्या का अध्ययन किया; तलवार, भाला और कटार चलाने में दक्षता हांसिल की; विवाह से पहले ही केवल महिला सिपाहियों की एक सेना बनाई; एक राजा से शादी की; 16 वर्ष की उम्र में माँ बनी; चार महीने बाद ही अपने बेटे को खो दिया; और उसके दो वर्ष बाद अपने पति को; उन्होनें झांसी राज्य की कमान संभाली; अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग की; और ऐसा युद्ध किया कि अंग्रेज़ जनरल भी उनकी बहादुरी और कौशल की प्रशंसा करने लगे थे; अंत में रानी ने बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति पाई।

क्या यह सब आपको रोमांचित नहीं करता? मुझे तो करता है! इसीलिए आज भी हर भारतवासी रानी लक्ष्मीबाई का सम्मान करता है और इसीलिए मुझे उन्हें “हमारी रानी” कहने में कोई संकोच नहीं है। झांसी की रानी भारतीय स्त्रियों के साहस और बहादुरी की मिसाल बन गईं। वे हमारे राष्ट्र का गौरव हैं।

झांसी की रानी द्वारा अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ी गई लड़ाई के फ़ोटोग्राफ़्स उपलब्ध नहीं हैं –लेकिन लड़ाई के खत्म होने के बाद कुछ तस्वीरे ली गईं थी जो अभी भी उपलब्ध हैं।

अगर हम “हॉफ़मैन” द्वारा लिए गए चित्र को छोड़ दें तो लक्ष्मीबाई की छवि के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। आस्ट्रेलियन पत्रकार जॉन लैंग को 1854 में झांसी की रानी से मिलने और बात करने का दुर्लभ मौका मिला था। बाद में लैंग ने रानी के बारे में अपने अखबार “द मोफ़ुसिल” में लिखा था (मैं अंग्रेज़ी से अनुवाद कर रहा हूँ):

जब वे छोटी रही होंगी तो उनका चेहरा बहुत ही सुंदर रहा होगा (लैंग से मुलाकात के समय रानी की उम्र 19 वर्ष थी) और अभी भी उस चेहरे में बहुत-से जादू हैं। उनकी अभिव्यक्ति बहुत अच्छी और बुद्धिमत्तापूर् ण थी। उनकी आंखे विशेष रूप से अच्छी थीं और नाक नाज़ुक और करीने से बनी हुई थी। वे बहुत गोरी नहीं थीं हालांकि काली होने से भी वे कोसों दूर थीं। उन्होनें कानों में सोने के कुंडलों के अलावा और कोई आभूषण नहीं पहना था और उनका वस्त्र बिल्कुल मुलायम सफ़ेद मुस्लिन का था। वस्त्र उनके शरीर पर कस कर लपेटा गया था जिससे कि उनके शरीर की बनावट साफ़ झलक रही थी। यह बनावट काफ़ी अच्छी थी मैंने झांसी की रानी के असली फ़ोटोग्राफ़ के वाकई में असली होने का कोई दावा नहीं किया है। यह काम पुरातत्ववेत्ताओ ं का है। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि अपने पाठकों तक संदेश पहुँचा सकूं ताकि वे अखबार में छपी ग़लत तस्वीर को इंटरनेट पर फैलाना बंद कर दें।..

 साभार 

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प्रस्तुतकर्ता 

सवाई सिंह राजपुरोहित 
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