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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

गीत-------प्रेम पाती मिली...डा श्याम गुप्त


प्रेम पाती मिली, मन कमल खिल गया,
हम को ऐसा लगा, सब जहाँ मिल गया ॥

चाँद-तारे  धरा पर उतरने लगे ,
पुष्प कलियों से हिलमिल के इठ्लारहे।
देके आवाज़ गुपचुप  बुलाते मुझे ,
कोई प्यारा मधुर बागवाँ मिल गया॥

अक्षर -अक्षर मैं तेरी महक चंदनी
शब्द मानों तेरे ही चंचल नयन ।
भाव ह्रदय के मन की पहेली से  हैं,
छंद रस प्रीति पायल की छनछन बने ।।

पढ़के ऐसा लगा प्रेम सरिता का मन ,
तोड़ तटबंध  निर्झर बना बह गया।
ख़त तुम्हारा मिला, मन कमल खिल गया ,
पढ़ के ऐसा लगा सब जहाँ मिल गया ।

प्रेम पाती मिली, मन कमल खिल गया ,
हम को ऐसा लगा, सब जहाँ मिल गया ॥
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