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गुरुवार, 1 नवंबर 2012

नाई की दुकान


देश स्वत्रन्त्र हुआ तो कुछ लोग कहने लगे की देश में बन रहे बड़े 2 बाँध ही देश के लिए अब धर्म स्थल हैं । मैं उन की इन भावनाओ पर कोई आतंकी हमला नही करना चाहता हूँ कोई अपनी मां  को माता जी कहे मम्मी कहे या अम्मी कहे  मुझे इस में क्या आपत्ति हो सकती है परन्तु मुझे अपनी बात कहने का भी पूरा अधिकार है तभी तो मैं इस देश में स्वतन्त्रता माँनूगा वैसे अपनी बात कहने का अधिकार हो या न हो पर कहने को तो स्वतन्त्रता है ही पर लेखक कौन सा कम है वो भी छंटे हुए ही होते हैं वे भला अपनी बात को बिना खे कैसे रह सकते हैं चाहे खाए बिना रह जाएँ परन्तु वे  कहे या लिखे बिना कैसे रह सकते हैं इसी लिए कहता  हूँ कि  असल में तो आधुनिक समाज के धर्म स्थल तो नाई  की दुकान को ही कहना चाहिए आलतू फालतू चीजों को नही ।
मेरी यह बात सुन कर  भाई भरोसे लाल एक दम  मेरे प्रति पक्ष में खड़े हो गये जैसे मैंने सत्ता रूढ़ दल के आका के विरुद्ध कोई अपशब्द कह दिया हो या उन पर कोई घोटालेका आरोप लगा दिया हो । वे एक दम  प्रतिवाद करने लगे और प्रति वाद भी ऐसा करने लगे जैसे लोग अपने नम्बर बनाने के चक्कर में शोर मचाने लगते हैं और रोके से भी नही रुकते हैं परन्तु मैं भी अड़ गया कि  आप को मेरी बात सुननी  ही पड़ेगी नही तो .....,भरोसे लाल ने मेरे नही तो बाद मैं क्या कहूँगा इस के लिए कुछ क्षण इंतजार किया । पर मैं कुछ कह कर अपने आप को किसी बंधन में क्यों बाधूं  यदि मन कहता कि मैं खम्बे पर चढ़ जाऊँगा तो वे कहते कि कभी पेड़ पर तो चढ़ नही पाया खम्बे पर क्या चढ़ेगा और यदि मैं कहता कि आमरण अनशन करूंगा तो वे कहते ख़ुशी से करो और मरने से पहले तक  अनशन खत्म मत करना और न ही कोई मेरा अनशन तुडवाने आता आखिर मुझे खुद ही अनशन तोडना पड़ता और बच्चे बुलवा कर अपना अनशन खुद तोडना पड़ता पर मुझे बहुत बुरा  लगता कि मैं तो बच्चों से जूस पी  रहा होता और बच्चे बेचारे मेरे मुंह की और देख रहे होते मेरे गले से जूस नीचे  ही नही उतरता ।

मान लो मुझे यह सब कुछ करना पड़  जाता तो मैं अपनी बात कैसे कह सकता था फिर तो  उपवास  की  समाप्ति  पर  हीसब  खत्म हो जाता पर मैं इतना ना समझ भी नही हूँ जो बिना अपनी बात कहे रह जाऊं मरूं क्यों ,  मरे मेरे दुश्मन मैं तो अपनी बात कहूँगा और खूब शोर मचा कर उसे दुनिया में  मनवा भी लूँगा क्यों की आजकल का जमाना ही ऐसा है कि किस बात को मनवाने के लिए खूब शोर करो तो उस का असर जनता पर हो जाता है क्यों की जनता अपना दिमाग कहाँ  लगती है जो जैस कह  देता है उसे ही दोहराने लगती है बच्चों की तरह या मूर्खों की तरह कभी आसूओ की बाढ़ में बह जाती है कभीगम के पोखर में डूब मरती है कभी दारू को ही चरणामृत मान लेती है जिस से झूठ भी सच बन जाता है पर आप को खूब अच्छी तरह शोर मचाना आना चाहिए ।
हाँ तो मैं कह रह था की हमे यदि किस स्थान को आधुनिक धर्म स्थल कहना ही है तो वह  है नाई  की दुकान जिन्हें इन धर्म स्थलों की संज्ञा दी जा सकती है मेरी यह बात सोलह आने यानि शत प्रतिशत या हन्दरद परसेंट एक दम  सही है इस में किसी को कोई शक नही होना चाहए और यदि कोई एक भी विरोध करेगा तो वह निश्चित देश द्रोही होगा ऐसे लोग हर काम में गलती ही देखते रहते हैं यह तो उन की आदत ही है ऐसे लोग कोई काम ही नही करने देते हैं मैं तो सत्ता रूढ़ पार्टी की तरह भुत कुछ करना चाहता हूँ पर मेरे विरोधी विपक्षी पार्टियों की तरह मेरे विरोध करते रहते हैं और मुझे कुछ करने ही नही देते हैं आखिर मैं कुछ तो कर ही रहा  हूँ चाहे उल्टा करूं या सीधा उन्हें सोचना चाहिए की मैं कुछ तो कर ही रहा हूँ पर वे अपनी आदतों से बाज खान आते हैं परन्तु मैं उन की प्रवाह भी नही करता वो कुछ दिन में अपने आप थक हर कर  चुप हो जायेगें नही तो और त्रिकोण से चुप करा दिया जायेगा ।
इस लिए मुझे मेरी बात कहने दो जो पूछना है बाद में पूछना यदि मैं पूछने का मौका दूं नही तो मैं अपनी बात कह कर  जैसे नेता प्रेस कान्म्फ्रेस खत्म कर देते ऐसे ही मैं भी अपनी बात कह कर  चलता बनूंगा और यह जरूरी नही की मैं आप के प्रश्नों का उत्तर ही दूं क्यों की यदि उत्तर दूंगा तो जरूर फंस जाऊँगा इस से तो अच्छा है कि बस अपनी बात कहूं और किसी की भी न सुनूँ बाकि जो कहते हों वे कहते रहें ।इसी लिए मैं कहता हूँ की नाई की दुकान ही वास्तव में आज के पूजा स्थल हैं । तब भाई भरोसे लाल कहा कि यह सिद्ध भी करना पड़ेगा केवल मेरे कहने भर से काम थोड़ी चल जायेगा तब  मुझे लगा कि भाई भरोसे लाल अब कुछ सुनने के मूड में आ गये हैं क्यों की अब वह मेरे खिलाफ बोल 2 कर थक चुके थे । मुझे भी इसी मौके का इंतजार था तो मैं भी शुरू हो गया की देखो आप को कहीं  भी सुबह या शाम को जाना किसी धार्मिक स्थल पर जाने की जरूरत नही है आप जब भी बाजार की तरफ निकले या वहन से गुजरे तो नाई की दुकान जरूर बाजार में मिलेगी बस  वहाँ  आप अपना सर झुका  लिया करें क्यों कि एक तो वहां  वैसे ही अच्छे 2 आ कर अपना सर झुकाते हैं परन्तु यहाँ वैसे भी आते जाते सर झुकाने के बाद आप को कहीं  सर झुकाने की या किसी धर्मिक स्थल पर जाने की जरूरत ही नही पड़ेगी ।
अरे भाई !बताओ तो कैसे ?भाई भरोसे लाल झुझला कर बोले ।तो मैंने कहा देखो नाई की दुकान ही एक ऐसी जगह है जहां सभी धर्मों या मतों के पूजनीय चिह्न व् चित्र एक साथ होते हैं बताओ और किसी दूसरी जगह कहीं  देखे हैं आप ने ? मन्दिर में जाओगे तो आप को अन्य  मतों के चिह्न नही मिलेंगे या मस्जिद में या चर्च में तो किसी अन्य  मत के प्रतीक चिह्न का तो सवाल  ही नही पैदा होता है परन्तु यहाँ नाई की दुकान पर आप को सब मिल जायेंगे बेशक सरकार इस के लिए गला फाड़ 2 कर चिल्लाती है रात  दिन एक करती है पैसा भी पानी की तरह बहाती है परन्तु उस के बाद भी कहीं साम्प्रदायिक एकता दिखाई नही देती है न चर्च में न मस्जिद में और न ही कहीं और सिवाय नाई की दुकान के बताओ भाई भरोसे लाल जी ऐसा है या नही है ।
परन्तु उन के पास मेरे इस तर्क का कोई जबाब  नही था परन्तु फिर भी वे इतनी आसानी  से हर मानने वाले नही थे । इसी लिए चुप रह कर  भी मेरी ओर  अन्य  सबूतों के मांगने की मुद्रा में मुहं बनाये रहे परन्तु मैंने कहा पहले मेरी इस बात की हाँ भरो तब और भी बताऊंगा तो उन्हें मजबूरी में अपना  सिर  हिलाना ही पड़ा ।परन्तु मन से नही उपर 2 से ही तो मैंने उन्हें दूसरा उदाहरन बताया की जैसे अंग्रेजों ने हमारे यहाँ पूरिनमा  और अमावश्या के अवकाश को बंद कर दिया और रविवार यानि इतवार या संडे  की छुट्टी जबरदस्ती करवानी शुरू कर दी तब हमे भी जबरदस्ती छुट्टी करनी पड़ी क्यों तब तो गोर अन्गेर्जों का दबाब था पर बाद में काले अंगेजों का भी उतना ही दबाब  रहा और इतवार की ही पहले की तरह छुट्टी होती रही और वह भी सरकारी आदेश से ।
परन्तु देखो नाई की दुकान के लिए कोई ऐसा आदेश नही है वे सरकार के इस दबाब या आदेश  को नही मानते हैं वे इतवार को छुट्टी नही करते बताओ आप क्या कर लोगे अपितु वे तो इस का खूब फायदा भी उठाते हैं और इतवार को तो  सारे  दिन ही काम करते हैं अपितु वे मंगलवार को छुट्टी करते हैं क्यों कि  यहाँ पर मंगलवार को बाल  नही कटवाते हैं और न ही नाखून ही काटते  हैं और इसी दिन  हनुमान जी की पूजा के कारण  ही ज्यादातर  इस दिन मांस आदि का सेवन भी नही करते हैं इसी लिए मंगल वर के दिन नाई भी अपनी दुकान बंद रखते हैं चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान ।
इस के बाद भी भाई भरोसे लाल इतनी आसानी से मानने वाले नही थे तो उन्होंने कहा की धर्म स्थलों की जगह भला नाई की दुकान कैसे ले सकती है ।तब  उन्हें समझाया कि सब लो धर्म स्थलों पर अच्छाई के लिए जाते हैं परन्तु आप बताओ मन्दिरों में भी भगवान जी के दर्शन के लिए  पंक्तियों में खड़े लोगो की भी जेब कट  जाती हैं या जूतियाँ चुरा ली जातीं  हैं और शुक्रवार को यानि जुम्मे की नमाज के बाद भी लोग सडकों पर उत्पात मचाते   हैं आगजनी कर देते हैं लूटपाट कर देते हैं यहाँ तक कि हत्या तक करने में परहेज नही करते हैं इसी तरह चर्च में भी दूसरों का धर्म खरीदने की योजनायें बनती हैं । इन सब से अच्छी तो नाई की दुकान है क्यों कि वहाँ कम से कम लोग झगड़ा तो नही करते हैं और अपनी 2 बरी आने तक लोग सभी मतों के प्रतीकों के दर्शन करते रहते हैं ।
 भाई भरोसे लाल जी अब बताओ नई की दुकान अच्छी है या कुछ और इसी लिए मैं इसे धर्म स्थल कहता हूँ और इतना ही नही यह आधुनिक धर्म स्थल इस लिए भी है की यह लोकतंत्र या प्रजा तन्त्र की  पाठशाला भी तो  है संसद की ही भांति सभी पार्टियों के लोग यहाँ आते हैं और सभी अपनी 2 पार्टी के पक्ष में बातें करते हैं तथा दुकान का मालिक नाई  जी सभापति  की ही भांति सब की सुनता रहता है  पर वह निष्पक्ष होने के नाते अपनी राय  नही देता है वह तो पार्टी से उपर उठ कर सब की सुनता है और कर्म की पूजा करते हुए अपना काम करता रहता है ।
भाई और सुनो ये नाई  की दुकान समय के साथ 2 प्रगतिशील भी खूब है भाई भरोसे लाल आप ने बचपन में नई से सिर पर खूब गुठली फिरवाई होगी परन्तु अब जा कर देखो गुठली फिरवाने की बात तो दूर अब तो वहां क्या बड़े 2 आदम कद दर्पण लगे होते हैं और अब वह शायद गुठली फिरवाना समझे भी नही की कैसे गुठली फेरी जाती है वहां खड़ा उन का पोता इस गुठली फेरने की बात पर जोर से हंस पड़ा तब मैंने मैंने उसे पूछा कि बेटे तुम्हे पता है यह गुठली फेरना क्या होता है उस ने न में सिर हिलाया तब मुझे बताना पड़ा कि जब तुम्हारे दादा जी के बाल काटने नाईआता  था तो मैं और तुम्हारे दादा जी दोनों भुस के बोंगे यानि चारा रखने के स्थान में जा कर  छुप जाते थे तब हमे वहां भी ढूंढ कर  निकल लिया जाता था और हम दोनों के सिर पर गुठली फिरवा दी जाती थी क्यों की सर्दी में खोपड़ी पर उस्तरा फिरवाने से यानि पूरे बाल  सफा चट  हो जाने पर  सर्दी लग जाने का खतरा रहता था इस लिए छोटे 2 बाल काट  कर  ताऊ नाई  हमारे सिर पर आम की आधी कटी हुई गुठली घुमा देता था जिस से हमारे सर में महीनों की जमी धुल उस गुठली में आ जाती थी क्यों तब आज कल जैसे शैम्पू या साबुन तो थे नही बस  कुएं पर जा कर शरीर के उपर पानी बिखेर आते थे इस लिए सर पर गुठली फिरवाना जरूरी था इसे ही गुठली फिरवाना  कहते हैं समझ गये वैसे ठीक से तब ही समझ आएगी जब आप अपने सर पर गुठली खुद ही फिर्वाओगे  ।
भाई भरोसे लाल बच्चे का कारण  बात कहीं और चली गई पर चल तो नाई की दुकान की ही हो रही है परन्तु आप को मेरी बात से सहमती तो रखनी ही पड़ेगी कि मैं जो कह रहा हूँ वह एक दम  सोलह आने सही है ।

व्यंगकार :- श्री डॉ. वेद व्यथित जी
अनुकम्पा - 1577 सेक्टर -3 
फरीदाबाद 121004 
09868842688 
  
चित्र गूगल से साभार  

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प्रस्तुतकर्ता :- sawai singh rajpurohit

सोमवार, 16 जुलाई 2012

सम्भावना है .



भीषण गर्मी पड़ रही थी न बिजली न पानी , लोग सडकों पर जाम लगा रहे थे क्योंकि वे और तो कुछ कर भी नही  सकते थे | बार -बार बिजली जाने के बाद जब आती तो लोगों को खुशियाँ मनाने का मौका मिलता कि वाह भाई वाह बिजली आ गई वह आये चाहे कुछ ही मिनट के लिए |पर कुछ ही समय बाद फिर से गुल हो जाती | परन्तु बिजली जाने पर भी लोगों के फ्रिज व टेलीविजन तो खुले यानि ऑन ही रहते हैं क्योंकि आखिर दिन में कितनी बार बटन बंद करें व खोले इस से तो अच्छा है खुले ही छोड़ दें इसी लिए ही मेरा भी टेलीविजन खुला हुआ ही था | बहुत देर से देश के हाल चल जानने का मन था कि कोई नया घोटाला हुआ है  या नही |इसी चक्कर में टी वी के सामने ही मजबूरी में बैठा था | तभी मुझे भी ख़ुशी मनाने का अवसर मिला यानि बिजली महारानी जी आ गई परन्तु  जब बिजली आई तो उस समय टेलीविजन पर मौसम  का हाल बताया जा रहा था कि आगे आने वाले  चौबीस घंटों  में गरज के साथ छींटे पड़ने की सम्भावना है | मैं बहुत प्रसन्न हुआ कि चलो चौबीस घंटे तो जैसे तैसे कट  ही जायेंगे पर इस के बाद तो गरज के साथ छींटे पड़ ही जायेंगे | मुझे प्रसन्न होते देख कर मेरी पत्नी जी को कुछ होने लगा स्वाभाविक है कि उन के मन में अच्छे २ ख्याल तो हो ही नही सकते थे इसी डर  से कांपते हुए मैंने उन्हें अगले चौबीस घंटे में गरज के साथ छींटे पड़ने की सम्भावना के बारे में बताया |
जब उन को इस बात की पक्की तसल्ली हो गई कि मेरी प्रसन्नता का वास्तव में यही कारण है तब जा कर मेरी  जान में जान आई नही तो वे चौबीस घंटे क्या अगले  चौबीस सैकेंड में ही मेरे उपर घोर गर्जन के साथ मूसलाधार वरिश  में बरस  पड़तीं  परन्तु छींटे पड़ने की सम्भावना से उन के भीतर भी उबल रहे ज्वाला मुखी पर भी कुछ छींटे पड़ ही गये परन्तु यह भी मेरी सम्भावना ही थी जैसे मौसम विभाग सम्भावना व्यक्त करता है कि उस की कोई गारंटी नही है कि वरिश होगी ही यह तो केवल सम्भावना ही है ऐसे ही मेरी श्री मती जी के क्रोध के बारे में भी सम्भावना ही रहती है कि यह गारंटी नही है कि उन्हें अब क्रोध नही आएगा | यह केवल मौसम विभाग जैसी सम्भावना है पक्की गारंटी नही है यानि सम्भावना तो सम्भावना ही है और सम्भावना निश्चित नही होती , वह हो भी सकती है और नही भी हो सकती है |
वैसे भी मौसम विभाग  हमारे बाप का नौकर तो है नही जो ठीक २ बताये कि बारिश होगी ही या गर्मी यूं ही झुलसती रहेगी | वह तो केवल सम्भावना ही व्यक्त करता है क्यों कि हमारे देश में  यह जुगाड़ के बाद जो दूसरे नम्बर की चीज है जिस पर देश चलता है वह यही सम्भावना ही तो है | देश ही  क्या देश की राजनीति ,  समाज ,व्यक्ति , घर गृहस्थी सभीकुछ तो इस सम्भावना पर ही चलती रहती है | ये सम्भावनाये न हों  तो दुनिया का सुचारू रूप से चलना  भी मुश्किल हो जाये और दुनिया में आदमी का जीना भी दूभर हो जाये |हम बचपन से ही सम्भावनाओं में जीना सीखते हैं  या सीख जाते हैं और मरते दम तक हमारी सम्भावनाये समाप्त नही होती हैं | कुछ न कुछ सम्भावनाएं बनी रहती हैं | यह बात अलग है कि ये सम्भावनाएं पूरी कहाँ होती हैं पर हम सम्भावनाएं करते रहते हैं हमे सम्भावना रहती है कि हमारी शादी किसी ऐसी लडकी से होगी कि जिसके आगे  एश्वर्य राय या कटरीना आदि तो कुछ भी न लगें और इसी सम्भावना में लडके बहुत सारी लडकियो के विवरण इक्कठे कर के  २ छांटते  रहते हैं परन्तु होता क्या है आखिर में जो मिल गई वह ही ठीक है और फिर सम्भावना बनी रहती है कि यह यह अपने इस सुमुखी रूप  को ही बनाये रखे कहीं  देवी के काली रूप में प्रकट न हो जाये इसी सम्भावना में हम उस की कई तरह की मांगें पूरी करते रहते हैं |
कभी उस को गहने यानि आभूषण दिलवाते हॆं कभी सुन्दर २ साडियां व सलवार कमीज खरीद कर देते हॆं ।बेशक खुद फटी  पॆंट से ही काम चलाते हॆं ऒर कभी २ दोस्तों से पॆसे उधार ले कर उस को बाहर खाना खिलवाने ऒर पिकचर दिखाने ले जाते हॆं ।क्यों कि यह भी सम्भावना रहती हॆ कि कहीं यह जो "मैं मायके चली जाउंगी "वाला गाना गुनगुना रही होती है उसे कहीं साकार  न कर दे यानि सच में मायके न चली जाये | इस के अलावा और भी बहुत सी सम्भावनाएं हम करते रहते हैं |
इसी तरह लडकियाँ भी बहुत सी सम्भावनाएं करती रहती हैं कि उन का होने वाला वो बहुत ही अच्छा होगा देखने में एक दम हीरो , बहुत पैसे वाला  और साथ में बहुत ही सुशील और सभ्य यानि सर्व गुण सम्पन्न तथा उस की ऊँगली के इशारे पर नाचने वाला परन्तु हैं तो ये सम्भावनाएं ही और इस के बदले मिल जाता है मेरा जैसा नही आप जैसा | बुरा मत मानना मैंने यह बात इस लिए कही है कि मेरी पत्नी मुझे अपनी सम्भावनाओं के अनुसार उन पर खरा नही मानती हैं |वह मुझे पागल , बेवकूफ ,आलसी और न जाने क्या २ विशेषण समय २ पर देती रहती है | यदि आप के साथ भी ऐसा ही है तो फिर मैं और आप दोनों ही एक जैसे हैं परन्तु आप मेरे जैसे लेखक तो नही होंगे आप तो पैसे कमाने वाले बढिया पति ही होंगे |
इसी तरह सम्भावनाएं जिन्दगी में सब के साथ होती हैं पर वे सम्भावनाये ही तो होती हैं इसी लिए मौसम विभाग की सम्भावनाओं की तरह ही जरूरी नही कि वे पूरी  हो जाएँ  हम इस सम्भावना से वोट डालते हैं कि ये नेता हमारे काम आयेंगे या इस से जो सरकार बनेगी वह देश और समाज की उन्नति करेगी , घोटाले नही करेगी ,लोकपाल बिल बनवाएगी , भ्रष्टाचार खत्म कर देगी परन्तु ये सब हमारी सम्भावनाएं ही तो होती हैं और आप को पता ही है कि सम्भावनाएं पूरी नही होती क्योंकि वरिश मौसम विभाग की सम्भावना के बाद आती ही नही है | इसी लिए सरकार भी हमारी स्म्भाब्नाये पूरी क्यों करे वह वरिश के बजाय  कड़ी धूप निकल देती है यानि खूब महंगाई बढ़ा देती है भ्रष्टाचार बढ़वाती है घोटालों में बढ़ोतरी की तो पूछो ही मत और फिर उन घोटालों की फाइलों को नष्ट करवाने के लिए आग भी लगवा देती है और न ही लोकपाल बिल ही बनवाती है क्यों कि ये सब भी तो हमारी सम्भावनाएं ही तो थीं | फिर पूरी कैसे होती |
इसी तरह और भी बहुत सी सम्भावनाएं हम जीवन भर करते रहते हैं परन्तु लगता है मौसम विभाग वालों ने सम्भावनाओं की इतनी ऐसी तैसी कर दी है कि वे पूरी होती ही नही | हम, इस सम्भावना से बच्चों का पालन पोषण करते हैं कि वे बड़े हो कर हमारी सेवा करेंगे तथा आज्ञाकारी बनेंगे श्रवण कुमार की तरह माता पिता के भक्त परन्तु हम ये सब सम्भावनाएं ही तो करते हैं शायद  इसी लिए बच्चे इन्हें हमारी सम्भावनाएं  मान कर पूरी न करते हों | हो सकता है यदि हम सम्भावना न करें तो वे ठीक से सेवा आदि भी कर दें परन्तु न तो हम सम्भावनाएं करनी छोड़ते हैं और न ही वे पूरी होती हैं |
इसी प्रकार हम भगवान जी के मन्दिर में प्रसाद चढाने जाते हैं और प्रसाद चढाने के बाद   हमे सम्भावना रहती है कि भगवान जी हमारी मांगे तुरंत पूरी कर देंगे | हमारी लाटरी निकलवा देंगे , आई पी एल में लगाया पैसा भगवान जी चार गुणा करवा देंगे , हमे घोटालों से बरी करवा देंगे , हमे देश का मंत्री या प्रधान मंत्री बनवा देंगे यानि हमारी हर कामना पूरी कर देंगे हम ऐसी बहुत सी  सम्भावना करते रहते है परन्तु ये पूरी होती कहाँ हैं परन्तु प्रसाद तो हम इन के पूरी होने की सम्भावना में चढ़ा ही चुके होते हैं पर हमारी मंगों को पूरी होने की सम्भावना अधूरी ही रह जाती है |
इसी तरह लडके लडकियाँ फेस बुक पर इस लिए लगे रहते हैं कि कोई बढिया सा दोस्त मिल जाये भाई बहन आदि नही अपितु फ्रेंड  मिल जाये क्यों कि फ्रेंड फ्रेंड ही होता है जो उम्हे कभी भी धोखा दे सकता है पर वायदा उन की हर इच्छा पूरी करने की करता है | इसी सम्भावना में वे घंटों फेस बुक पर अपना कीमती समय बर्बाद करते रहते हैं जो समय पढने या दूसरे जरूरी कामों का होता है उसे ही वे फ्रेंड मिल जाने की सम्भावना में ही बर्बाद कर देते हैं फिर माँ बाप कहते हैं कि हमारा बच्चा तो कम्पुटर की वजह से खराब हो गया वह तो बड़ा होनहार था | उस के बाद तथा कथित समाज शाश्त्री भी टी वी पर आ कर कम्पुटर को कोसना शुरू कर देते हैं पर उन्हें कौन समझाये कि तुम्हारे इन होनहारों की वजह से ही फेसबुक खराब हुई है न कि फेस बोक की वजह से ये निक्कमी औलाद |
लडके लडकियों की तो कोई बात नही उन की तो उम्र ही है वे तो यौवन की दहलीज पर होते हैं परन्तु हद तो इस सम्भावना की तब होती है जब खूंसट बूढ़े २ भी अपनी जवानी कि फोटो लगा कर और अपनी कम उम्र बता कर लडकियों  से दोस्ती की सम्भावना में चैट यानि बतियाते रहते हैं जब कि उन्हें इस उम्र में तो भगवान जी का नाम ले लेना चाहिए परन्तु वे भगवान जी का नाम क्यों लें क्यों कि वे तो अंग्रेज बनने के चक्कर में होते हैं जब कि अंग्रेज इस ऐबों को छोड़ कर तिलक जनेऊ व चोटी धारण कर के भगवान के प्रति समर्पित भाव से कीर्तन करते नजर आते हैं परन्तु यहाँ के बुड्ढे  तो रोज २ बिगड़ने का कम्पीटीशन करते नजर आते हैं आपस में बैठ कर भी दोस्तों से अपनी जवानी की बाते ही दोहराते रहते हैं क्यों कि अब भी उन्हें इन के दोहराए जाने की सम्भावना रहती है |
इसी प्रकार बुढियाभी बैठी २ बहुओं को खूब परेशान करती रहती हैं वे  उन से ऐसी २ बातें  करतीं हैं कि जिन का कोई सिर पैर नही होता वे ऐसी बातें इस सम्भावना से करती हैं कि इस के कारण बहुएं और दहेज ले आएँगी परन्तु बहू अपने मायके खबर भेज देती है कि अब दहेज भेजने की कोई जरूरत नही है क्यों कि बुढिया के मरने की सम्भावना है परन्तु होता उल्टा है और सास के उपर पहुंचने की सम्भावना करते २ खुद सास बहू को उपर पहुंचा देती है | पर सास के उपर जाने की सम्भावना पूरी नही होती है | इसी तरह आदमी अपनी जिन्दगी की खूब गाढ़ी कमाई जिसे पाई २ जोड़ कर इक्ठटा करता है पाई २ के लिए वह लोगों से झगड़ता रहता है और उस पैसे से बड़ी २ हवेलियाँ यानि बड़ी सी बिल्डिंग बनवाता है क्यों कि उसे सम्भावना होती है कि वह इसी मकान में सदा रहेगा या उस की औलाद इस में से कहीं बाहर पैर भी नही रखेगी और उस की सेवा करेगी परन्तु उस की यह सम्भावना धरी की धरी रह जाती है बच्चे न तो ठीक से उस की सेवा करते हैं और न ही उस के बनाये मकान में ही रहते हैं वे जहाँ नौकरी करते हैं वहीं  अपनी पत्नी और बच्चों को ले कर किराये के मकान में रहने चले जाते हैं किराये के मकान में चाहे कितनी ही परेशानियाँ उठानी पड़े उठाते रहते हैं फिर वहीं  पर वे भी घर खरीदने की सोच लेते हैं इस के लिए बेशक उन्हें अपने बाप का बनाया हुआ मकान ही क्यों न बिकवाना पड़े चलो उन की तो मजबूरी होती है परन्तु बूढ़े की सम्भावना तो धरी की धरी रह जाती है जब मरने के बाद बच्चे समय पर उस के संस्कार के लिए भी नही पहुंच पाते हैं और पड़ोसी ही संस्कार कर के उसे निपटा देते हैं क्यों कि उन का भी काम में हर्जा हो रहा होता है |
जिन्दगी में हम ऐसी २ कितनी ही सम्भावनाएं करते हैं और सोचते रहते हैं कि ये पूरी होंगी परन्तु अधिकतर सम्भावनाएं मौसम विभाग द्वारा व्यक्त की गई वरिश आने की सम्भावनाओं की तरह ही अधूरी रह जाती हैं परन्तु फिर भी हम एक के बाद एक नई २ सम्भावनाएं करते रहते हैं और उन के पूरे होने की सोचते रहते हैं इसी में कुछ समय बाद पता चलता है कि जिन्दगी लगभग पूरी होने वाली है परन्तु फिर भी सम्भावनाएं करना हम बंद नही करते हैं परन्तु एक दिन यूं ही हमारे मरने की सम्भावना जरूर पूरी हो जाती है ||
व्यंगकार :- श्री डॉ. वेद व्यथित जी
 अनुकम्पा - १५७७ सेक्टर ३ 
फरीदाबाद १२१००४ 
चित्र गूगल से साभार  
  नोट :- चित्र आदि गूगल इमेजेस आदि साइट्स से लिए गए हैं! यदि किसी कॉपीराइट का उल्लंघन हो रहा होतो कृपया सूचित करें - चित्र हटा लिए जायेंगे!

शनिवार, 23 जून 2012

गर्मी और पानी ............डॉ. वेद व्यथितजी

भारत के कुछ प्रदेशों में गर्मी का मौसम क्या शुरू होता है लोग बूँद २ पानी को टीआरएस जाते हैं पानी की एक २ बूँद सच्चे मोती की तरह लगने लगती है नलों में पानी आना तो दूर बूँद भी टपकती देखने को लोग तरस जाते हैं | लोग रात २ भर जाग कर पानी के लिए प्रेमिका की तरह इन्तजार करते हैं की शायद कभी एक बूँद के प्रेमिका की तरह दर्शन हो जाएँ परन्तु पानी भी क्या करे | लोगो से अपने गाँव के कुए का ठंडा मीठा पानी पिया ही नही गया और चल दिए शहर में बूँद २ पानी को तरसने आ गये जैसे शहर में में तो मुफ्त में लड्डू बत रहे हैं कि लो जी आओ और भोग लगाओ और इतना ही नही छोटे २ कस्बिन में भी कालोनी पर कालोनी नेताओं के नाम पर बस्ती चली गईं और अब भी बसे जा रही है जैसे मधु मक्खियों का छत्ता बढ़ता जाता है वैसे ही | फिर आखिर इस तरह बढ़ रही आबादी के लिए पानी कहाँ से आये |
आखिर सरकार भी क्या करे लोग आबादी को ही धर्म की कसम कहा २ कर दिन दुगनी रात चौगुनी नही अपितु आठ गुनी बढ़ाने पर लगे हैं | तो फिर सरकार भी इतनी पाइप लाइन , ट्यूबेल व उन्हें चलाने के लिए बिजली आखिर कहाँ से लाये सरकार | सरकार की भी तो अपनी सीमाएं हैं | उस के भी तो खर्चे हैं |आखिर सरकार के मंत्रियों व मुख्य मंत्री व अधिकारयों आदि को देश विदेशों के करने पड़ते हैं | उन के दौरों के समय तुरंत सडकें बनवानी पडती हैं मंच , पंडाल व दावत आदि की व्यवस्था करना उन के वेतन भत्तों का इंतजाम करना अपने निकट के ठेकेदारों को काम देना गोबर के उपयोग के लिए विदेश यात्राएं करना , गरीबी की रेखा टी करने के शौचालय बनवाना ताकि वहाँ गरीबी पर ठीक से सोचा जा सके बड़े २ पांच सितारा होटलों में मीटिंग करवाना , पानी बचाओ अभियान पर प्रचार सामग्री च्प्व्वना व बंटवाना और उस की रिपोर्ट बनवाना आदि २ कहाँ २ तक गिनवाए जाये सरकार के काम | फिर बजट में से इतना पैसा बचता कहाँ है जो रोज २ नई २ पाइप लाइन ही सरकार बिछाती रहे |
परन्तु लोग है कि सरकार के पीछे लठ्ठ लर कर पड़े रहते हैं |गर्मियां आई नही कि विरोधी पार्टियों के कार्य कर्म पहले ही निश्चित हो जाते हैं कि कब २ कहाँ २ और किस २ कालोनी के लोगों से खाली मटके ले लर प्रदर्शन करवाना है क्यों कि अब लोग घरों में तो पानी के लिए मटके रखते ही नही है इसी लिए पार्टी के कार्य कर्ताओं को मटके खरीदने का आदेश उपर से आ जाता है और लोग लोग प्रदर्शन की अगुआई करने के चक्कर में ख़ुशी २ फोड़ने के लिए मटके खरीद लेते हैं जिन्हें मुख्यालय पर जा कर फोड़ना ही होता है क्यों कि वहाँ से बचा कर तो उन्हें ला नही सकते और ले भी आयें तो उन्हें फ्रिज को हटा कर कौन रखता है घर में | इस लिए मटका फोड़ने की रस्म क्रिया कर ली जाती है |एक बात और है कि इस बहाने मटके वाले के मटके भी बिक जाते हैं नही तो अब मटकों में पानी भर कर पिने के लिए मटके खरीदता ही कौन हैं और जैसे ही गर्मी शुरू हो जाती हैं वैसे ही मटके वालों को प्रदर्शनों के कारण मटके बिकने की उम्मीद बढ़ जाती है |चलो इसी बहाने ही सही कुटीर उद्योग का भी विकास हो जाता है |
परन्तु इस के बाद भी पानी की समस्या वहीं की वहीं रहती है और लोग बरसात की प्रतीक्षा करने लगते हैं क्यों कि ज्यद्फा गर्मी के कारण कोई २ बादल आसमान दिखाई दे जाता है |इन प्रदर्शनी से न तो पानी आता है और न ही पिप लाइन ही बिछाई जाती है | आप को वैसे ही पहले जैसे ही हर साल की तरह ही एक दो महीने साल में पानी की बूँद २ के लिए तरसना ही होता है | परन्तु विचारनीय यह है कि इन दो महीनों में किस तरह बिन पानी गुजारा किया जाये | असली समस्या तो यह है |


इस समस्या को दूर करने के लिए यदि मैं सरकार को दो चार सुझाव दूं तो सरकार कौन सा मेरे सुझावों को मान ही लेगी क्योंकि सरकार के पास पहले ही बहुत से सुझाव आये रहते हैं लोग जबरदस्ती ज्ञापन दे २ कर सुझावों का ढेर लगये रहते हैं इसी लिए सरकार मिनट २ में गौर करती रहती है इसी लिए उसे गौरमिनट कहते हैं और फिर मैं कोई विशेषग्य भी तो नही हूँ , साधारण लेखक ही तो हूँ और न ही पार्टी का कार्यकर्ता यहाँ तो सरकार विशेषज्ञों के सुझावोंसे भी रद्दी की टोकरी को स्स्जती रहती है तो भला मेरे सुझावों का क्या होगा |कौन पूछता है आप चाहें तो आमरण अनशन तज कर लें | मरे २ मरे और जब बिलकुल मरने की नौबत ही आ जाएगी तो पुलिस आप को उठा कर अस्पताल पहुंचा देगी जहाँ डाक्टर आप का अनशन जबर दस्ती तुडवा देंगे| पर बात वहीं की वहीं रहेगी इसी लिए सरकार को सुझाव देने में मैं अपनी बुद्धिमानी नही मानता हूँ |
परन्तु हो सकता है आप को मेरे सुझावों में से कुछ आप को जरूर जंच जाएँ और आप उन में से दो चार पर अपनी पत्नी जी से विचार विमर्श कर के उन दो चार सुझावों को मान लें जिन से आप को फायदा होगा और उन में से जिन सुझावों से आप को पडौसियों से फायदा होगा उन्हें आप अदौसियों तक भी सरका देंगे ताकि आप पडौसियों से भी फायदा उठाने के धर्म को भी बखूबी निभा सकें |इसी लिए आप को सरकार न मान कर और अपने आप को महा बुद्धिमान समझ कर ये सुझाव आप को दे रहा हूँ | बेशक मुझे मेरे घर में कोई बुद्धि मान माने या व माने पर आप तो मान ही लेंगे फिर आप संकट के समय श्री सत्य नारायण स्वामी की कथा की तरह इन को बांच कर लाभ प्राप्त कर सकेंगे |

इन सुझावों में से सब से महत्व पूर्ण मेरा एक सुझाव यह है कि आप यदि कहीं जाएँ या न जाये पर आप आप के यहाँ आने वाले सभी रिश्तेदारों को खबर कर दो की आप तो गर्मियों में बाहर जा रहे हैं एयर तिकत भी बुक हो चुकी है कोई पूछे भी तो कह दो यदि आप कहे तो आप के यहाँ भी आ सकते हैं | वैसे कोई पूछेगा नही कि कहाँ जा रहे हैं और कोई ज्यादा ही पूछे तो इतने सारे पहाड़ी स्थान हैं जो छोटी कक्षा में पढ़े होंगे ही जैसे मंसूरी , नैनीताल , शिमला ,ऊंटी मनाली आदि २ कहीं का भी कह दो पर पत्नी को भी साथ २ बता देना कि मैंने फलने रिश्ते दार को फलन स्थान का नाम बताया है | और आप छुट्टियाँ होते ही किसी दूसरे शहर में रिश्ते दार के यहाँ जा धमको ताकि आप को पानी की किल्लत का सामना न करना पड़े ध्यान रखना आप अपने गाँव जाने को टालना| हो सके तो बच्चों के कान में नानी के घर जाने को उकसाना यहाँ आप की भी खूब अच्छी सेवा होगी और बच्चों की माँ भी खुश रहेगी परन्तु पत्नी जी फसल की चीजों की हिस्सेदारी मांगने की ज्यादा ही जिद्द करे तो कह देना छुट्टियों के आखरी दो तीन दिन के लिए चले जायेंगे और माल समेट लायेंगे |
इब यह सुनिश्चित हो जाये कि आप के यहाँ कोई मेहमान नही आ रहा है तो आप निश्चिन्त हो कर गर्मी २ सुख से जीयें परन्तु अपने यहाँ रहने पर भी आप को गर्मी के दो महीने काटने के लिए कुछ अन्य बातों को भी ध्यान में रखना होगा जैसे जब आप रोटी कहा चुकें तो पडोसी के घर पहुंच जाएँ और उन के छोटे बच्चे पर बहुत लाड बिखेरे कि अरे इसे क्यों रुला रहे हो मैं तो रोटी खाता २ ही बिना पानी पिए ही आ गया |इस के रोने की इ आवाज आ रही थी | कहाँ गया आप का छुटकू |जरा एक गिलास पानी मंगवाना उस से और इस प्रकार रोटी खा कर आप आसानी से पड़ोसी के घर इस भने जा कर आसानी दो चार गिलास पानी गटक कर आ जाएँ |
इसी तरह दो तीन बार उन के छोटे बच्चे के भने या किसी अन्य भने से जैसे डाकिया आ जाये तो पड़ोसी की डाक भी उस से आप ही ले लो और डाक देने के भने या घर वाली जब सब्जी खरीद रही हो तो उसे कहें कि पड़ोसन से भी पूछ ले कि लेकी तजि है उर सस्ती दे रहा है आप को भी लेनी है क्या और सब्जी वाले को मना कर दो ताकि वह चला जाये और अब अगले सब्जी वाले के आने तक वहीं जमे रहो पीछे से आप उन्हें ढूंढते २ उन्ही के घर पहुंच जाएँ कि अरे कहाँ चली गईं और वही दो चार गिलास पानी गटक लें |
परन्तु यह फार्मूला यदि पडोसी आप के जुप्र आजमाने लगें तो कह दो कि भाई कल से काम वाली बाई नही आई है सारे गिलास जूठे पड़े हैं | लाना जी जरा इन के लिय पानी सेंक (जूठे बर्तन रखने की जगह )में से ही गिलास ले लो पडोसी अपने आप मना कर देगा कि मुझे पानी नही पीना है जी मैंतो पी कर ही आया हूँ परन्तु कई बार आप के कई गहरे दोस्त भी होते हैं वे बिना सूचना समाचार के ही आ जाते हैं |
जब कोई ऐसा दोस्त आ ही धमके तो उन के लिए ठंडा कभी मत बनवाओ क्यों कि ठंडा पेय बनवाने में पानी ज्यादा खर्च होता है और उन के बैठते ही गर्मी का जिक्र शुरू कर दो और पसीने सुखाने का सुझाव दो तथा अपना ज्ञान भी उन्हें बताओ कि जैसे लोहे से लोहा कट्टा है वैसे ही गर्मी ही गर्मी को मारती है | इस लिए आप की गर्मी दूर करने के लिए आप को चाय पिल्वाई जाती है और उन के सीधे २ चाय बनवा दो और चाय से वे पानी मांगे तो बताओ कि ठंडा और गर्म हो जायेगा तो नुक्सान करगा इस लिए अब आप चाय ही पी लो पानी बाद में थोड़ी देर बाद पी लेना |
ऐसे ही कितने सारे और भी उपाय आप के दिमाग में भी होंगे ही जिन्हें आप रोज २ अपने पड़ोसियों पर आजमाते ही रहते होंगे उन्हें तो आप करते ही रहे और यदि कहीं कोई पानी बचाने के नये उपाय लागू कर रहा हो तो उन्हें भी ध्यान में रखें और आगे से उन्हें भी प्रयोग कर लें |
इस प्रकार भगवान आप का गर्मी २ खूब भला करेंगे क्योंकि आप भगवान की एक अमूल्य निधि को खर्च करने से बचा रहे रहे हैं | इस लिए भगवान जी भी आप को कम से कम पानी देंगे क्यों कि आप तो कम पानी में भी काम चला सकते हैं परन्तु जो लोग अन्य लोगों को मुफ्त पानी पिलाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं बेशक गर्म २ लूह के थ्पेधों वे तब भी स्टेशनों पा जा कर भी पानी पिला रहे होते हैं या सडकों पर भी पेड़ों के नीचे मटके रखवा रहे होते हैं या प्याऊ लगा रहे होते हैं तो मजबूरी में भगवान जी को भी उन के लिए भरपूर पानी का प्रबंध करना ही पड़ता है |
अब आप देख लो कि आप को कम पानी चाहिए या ज्यादा पानी |खुद के लिए भी और दूसरों को पिलाने के लिए भी या न पिलाने के लीये कम पानी यह तो आप पर ही निर्भर करता है |
व्यंगकार :-  श्री डॉ. वेद व्यथितजी  
dr.vedvyathit@gmail.com 
अगर आप भी इस मंच पर रचना या कवितायेँ प्रस्तुत करना चाहते हैं तो इस पते पर संपर्क करें...1blog.sabka@gmail.com

रविवार, 27 मई 2012

नजर बनाये रहिये .........डॉ. वेद व्यथित


 फोटो लिए है hansteraho.com

देश की राजधानी में बड़ी घटना घटित हो गई एक बड़े नेता जी फंस गये तो हंगामा भी बड़ा ही होना था और जब हंगामा होना है तो फिर टी वि चैनलवाले भला कहाँ पीछे रहने वाले थे वैसे भी यह तो बड़ा हंगामा था जब कि ये तो छोटे २ हंगामे को भी बड़ा तूफ़ान बना सकते हैं या बना देते हैं परन्तु कए करें कमबख्त समय भी बेवफा प्रेमिका से कम थोड़ी है जो तुरंत एक सैकेंड लगाये कहीं और चला जाता है बड़ी दुश्मनी निकलता है हरेक से क्यों कि जिन के पैसे के बल पर टी वि चैनल चलता है उन की एड ठीक समय पर दिखाना भी तो जरूरी है |क्यों कि जिस का नमक यानि पैसा खाया जा रहा है तो उसे हलाल करने का भी फर्ज बनता है इसी लिए चाहे समाचार रोकना पड़े या सम्वाददाता को चुप करवाना पड़े पर एड यानि विज्ञापन तो समय पर दिखाया ही जायेगा | इस के लिए बेशक कुछ भी हो जाये |
                       इसी लिए यह काम यानि समाचार दिखाना कोई आसन काम नही है कि अकेली उद्घोषिका या उद्घोषक इतने सारे लोगों को एक साथ निपटा ले और समय पर एड भी दिखवा दे | कितना बड़ा संकट होता है उन के साथ पर दूसरे के संकट से उन्हें क्या लेना देना यहाँ तो सब से पहले अपने को हल करने की लगती है परन्तु बेचारा सम्वाददा जो कितनी मेहनत से खबर बनाता या लता है उस को तो अवसर मिलना ही चाहिए |
परन्तु इतने सारा सम्वाद दाता शहर २ गली २ मैह्ल्ले २ फैले होते हैं कि गिनती भी मुश्किल है क्यों कि जिस के भी पास बढिया कैमरा हो उसे ही वे सम्वाददाता बना देते हैं | इसी लिए मेरे मौहल्ले के भी कई छोरों ने बढिया कैमरा खरीदने के लिए क्या २ पापड़ नही बेले कि पूछो ही मत कई न घर पर खूब क्लेश मचाया और कई ने और दूसरी तरह २की तिकडम बिठाई पर जैसे भी हुआ कई लडके बढिया सा कैमरा खरीदने में कामयाब हो गये वह भी इस लिए कि चलो अब तो उन का भी चेहरा टी वी  जरूर दिखाई देगा ही |
                विचार तो नेक था पर टी वी पर चहेरा दिखवाना कोई आसन काम है क्या ? ये मुंह और मसूर की दाल | पता नही कैसे और कहाँ से बनी होगी यह कहावत पर जैसे भी बनी हो यहाँ पर इसे लागू करने में मुझे भी अपने भाषा ज्ञान पर गर्व सा अनुभव हो रहा है कि मुझे भी स्कूल में हिंदी वाले गुरु जी के द्वारा रटवाए गये मुहावरे और उन का वाक्यों में प्रयोग करना  आता है या यूं कहूँ कि यह मुहावरा अचानक प्रयोग हो गया और मैं साहित्यकार बनने की कोशिश करने लगा परन्तु बात तो सम्वाददाता के चेहरा दिखने की थी कि मैं तो बीच में वैसे ही अपने मुंह मियां मिठ्ठू बन गया |
पर मुझे लगा साहित्यकार समझने की भूल से मुझे अपनेआप को विद्वान् समझने का भ्रम होने लगा | इसी लिए एक दो स्म्वाद्दाताओं पर भी रौब गांठने के लिए गाहे बगाहे उन्हें कोई कठिन शब्द बता देता था ताकि हो सके तो ये अपने चहरे के साथ २ मेरा भी चहेरा टी वी पर दिखवा दें पर यहाँ तो उन के ही चहेरा दिखने के लाले पड़े रहते हैं क्यों कि एक तो बड़े २ शहरों में ही रोज २ क्या घंटे दो घंटे में ही इतने बड़े २ हंगामे होते रहते हैं कि छोटे शहरों की तो बड़ी २ बातों का भी नबर नही आता है परन्तु कभी कभार दस बारह सैकेंड के लिए किसी भाग्य शाली सम्वाददाता को यह सैभाग्य प्राप्त हो जाये तो वाह २ क्या सौभाग्य है उस का |
                    ऐसा ही सौभाग्य मेरे छोटे से शहर में भी घट गया मुश्किल से बिल्ली के भागों छींका टूट गया बड़ी पार्टी के छोटे नेता जी बड़े चक्कर में आ गये | नेता जी बड़ी पार्टी से सम्बन्धित थे और घटना नेता जी से सीधे २ जुडी थी इस लिए घटना बड़ी हो गई , नही तो उसे कौन बड़ी घटना मानता और पुलिस वाले ही ले दे कर वहीं निबटा देते परन्तु अनसमझ नैसिखिये और जोशीले सम्वाददाता ने उस की सूचना अपने चैनल को भी दे दी | बस फिर क्या था चैनल वालों ने अपने पैनल वालों को आमंत्रित कर लोइय | कई २ पार्टियों के प्रवक्ता और तथा कथित विशेषज्ञों को न्योता दे दिया गया | सम्वाददाता से पूरा ब्यौरा पहले ही टेलीफोन से ले लिया गया | बस स्गुरु हो गया जबानी जंग का घ्माशन | इसी बीच सुबह से तैयार खड़े स्म्वाद्द्दाता को भी कहा गया कि बताओ वहाँ क्या हुआ | सम्वादाता का आज जैसे तैसे वर्षों का सपना पूरा होने जा रहा था कि आज तो उस का चहेरा टी वी पर जरूर पूनम के चाँद से भी ज्यादा कुछ सैकेंड के लिए चमकेगा ही परन्तु कई बार सिर मुड़ते ही ओले भी पड़ जाते हिंम पकी फसल पर भी दुर्भग्य से बिजली गिर जाती है |
                      ऐसा ही इस के साथ भी हुआ जैसे ही इस ने अपने ज्वाला मुखी से मुख के सामने माइक लगा कर बोलने के लिए मुंह खोला वैसे ही चैनल से  सम्पर्क टूट गया | बेचारे के पसीने छूओत गये पैरों के नीचे से जमीन खिसकने लगी बहुत कोशिश की परन्तु इस की आवाज चैनल तक नही जा सकी | परन्तु इतनी देर भला उद्घोषिका को कहाँ सहन थी इतनी देर तो वह अपने सामने किसी विशेषग्य को ही नही बोलने देती है जितनी देर तक यह कनेक्शन को ही ठीक करता रहा इतने सैकेंड बेकार चले गएर क्योंकि यहाँ तो सेकेंडों का हिसाब होता है सेकेंडों के हिसाब से पैसा लिया और दिया जाता है | इसी लिए जब कैनेकष्ण मिला ही नही तो उद्घोषिका ने उसे कह दिया कि हम आप के पास दुबारा आते हैं इतनी देर आप इस घटना पर नजर बनाये रहिये इतना कह कर उस ने कनेकशन काट दिया तथा वह दूसरे नेताओं के भयंकर वाक् युद्ध का मुस्करा २ आनन्द लेती रही जो एक दूसरे पर बिना सिर पैर के आरोप लगा  २ कर चिल्ला रहे थे कि मनो जनता को बता रहे हों कि यही हमारा चरित्र है इसे ठीक से परख लो कि कौन अधिक शोर मचा कर जनता को बेवकूफ बना सकता है और जो अधिक शोर मचा सकता है दूसरे को बोलने ही न देता हो अपने नेता या नेत्री की शान में ज्यादा कसीदे पढ़ सकता हो वही तो सफल और बड़ा नेता हो सकता है और प्रवक्ता भी |
                 परन्तु वहाँ तो कनेक्शन क्या टूटा बस यूं समझो कि बिजली कैमरे से निकल कर सीधे सम्वाद दाता पर ही गिर गई हो | परन्तु आशा तृष्णा कहाँ मरती हैं बेशक टी वि चैनल से कनेकशन ही तो टूटा हैं अब पता नही केंकष्ण कब जुड़ जाये इसी के पुन: जुड़ने की आशा हरेक सम्वादाता को बनी रहती है यही तो जिजीविषा है इसे ही तो जिन्दगी कहते हैं वरना तो मौत दूर ही कितनी रहती है जिन्दगी से | बस इस आशा और तृष्णा में सम्वाद दाता ने उद्घोषिका से इतना सुन पाया कि आप नेता जी पर नजर बनाये रहिये | हम आप के पास कुछ समय बाद फिर आते हैं |
परन्तु जब आप किसी पर नजर रखते हैं तो जिस पर आप कि नजर पड़ रही है वह क्या उसे पता नही चलेगी | जरूर पता चल जाती है कि आप पर कौन २ नजर लगाये हुए हैं क्यों कि नजर बड़े कमाल की चीज है ये नजरे तो बिना बोले भी बहुत कुछ बोलती रहती हैं बहुत कुछ कहती रहती हैं बहुत कुछ देखती रहतीं हैं और बहुत कुछ सुनती रहतीं हैं | भरी भीड़ में में जिस से चाहे बात कर लेतीं हैं 'बहरे भुवन में करत हैं नैनन ही सों नेह 'इसी लिए धीरे २ नेता जी को भी पता चल गया कि उन पर सम्वादाता नजरें बनाये हुए है और इसी कारण नेता जी सावधान भी हो गये कि उन पर नजर रखी जा रही है | इसी लिए उन्होंने सावधानी बरतनी शुरू कर दी परन्तु सम्वाददाता को और कौन सा काम था | उस ने भी पहले तो केवल नजर रखनी शुरू कि और बाद में तो नजरें गढ़ानी शुरू कर दीं क्यों कि नेता जी सावधान जो हो गये थे |
               परन्तु जब किसी पर नजरें गढ़ ही जाएँ तो भला वह उन जनरों से कितने दिन बच सकता है | आखिर नजर तो नजर है , कहते हैं नजर तो पत्थर को भी तोड़ देती है परन्तु जब नजर लग ही जाये तो लोग उस नजर को दूर करने का भी कोई न कोई इंतजाम भी पूरे जोर शोर से करते हैं ताकि वह अधिक हानि कर्क न हो जाये | इस लिए विभिन्न उपाय भी यहाँ प्रचलित हैं जिन में सिर के उपर से जूती घुमाने से ले लकर दान दक्षिण तक बहुत सारे उपाय हैं | बस इसी लिए कोई उपाय तो करना ही होता है इसी लिए नेता जी ने भी इस नजर को दूर करने का उपाय सोचना शुरू कर दिया |
इन में सब से पहला उपाय जूती या जूता घुमाने का था परन्तु यह उपाय तो नजर को दूर करने के बजाय नजर को और बढ़ा देता क्यों कि सम्वाददाता तो सब के लिए शनि देवता स्वरूप ही होता है जिस के कोप से वे भी डरते हसीं जिन से सब डरते हैं यानि पुलिस भी घबराती है और वह भी छोटे शहरों में तो ज्यादा ही क्यों कि पुलिस वालों को पहले भी इस के कई उदाहरण देखने को मिलते रहे हैं क्यों कि उन के कई बड़े अफसरान की इन के प्रेमालाप और विलाप के  चक्कर में नौकरी तो गई ही अपितु जेल बी भुगतनी पदी ऐसा ही पहले भीकई नेटों के साथ भी होता रहा है इसी कारण उन्होंने जूता उतराई के उपाय को नजर उतरने के उपाय में से छोड़ दिया |
                   परन्तु इस का कुछ न कुछ या कोई न कोई उपाय या इलाज तो करना ही था इसी लिए उन्होंने दान दक्षिण वाला उपाय ही इस के लिए ज्यादा बेहतर समझा परन्तु किसी को खो कि यह मेरे कष्टों की दक्षिणा है तो उसे कोई लेने के लिए राजी नही होगा पहले बात और थी परन्तु अब ऐसा नही है अब तो लोग आदमी के टुकड़े कर के भी दक्षिण ले लेते हैं परन्तु फिर भी कहीं न कहीं डॉ तो बना ही रहता है कि कोई मना न कर दे इसी लिए दक्षिण देने के दूसरे उपाय सोचे गये तो नेता जी ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की जिस में बढिया भोज और सुंदर उपहार की व्यवस्था की गई तो नजरे कुछ २ कम होनी होनी शुरू हो गईं |
उस के बाद तो निरंतर बिना नागा शनि पर तेल चढाने  की तरह ही दान दक्षिण का कार्यक्रम शुरू हो गया होली  और दीपावली तो स इस नजर से बचाव की दक्षिण के विशेष अवसर थे ही इस के आलावा भी बीच २ में और अवसर तलाश २ कर यह दान दक्षिण का कार्यक्रम सुचारू रूप से चलता रहा |
बस फिर क्या था धीरे २ दान दक्षिण के प्रभाव से नेता जी के कष्ट धीरे २ दूर होने शुरू हो गये जो नजर उन पर बनाई हुई थी एयर बाद में गढ़ाई हुई थी वह धीरे झुकने लगीं और फिर कुछ दिन बाद तो उन पर से हटा भी ली गई क्यों कि आखिर बेचारा सम्वाददाता कितनी देर तक माइक पकड़े खड़ा रहता आखिर वह भी तो एक दिल रखता है उस का दिल भी तो अच्छी २ चीजों के लिए मचलता है आखिर उस का मन भी तो कोठी , कार और दूसरे साधनों के लिए ललचाता ही है |क्यों कि वह भी तो इन्सान ही है इसी लए वह एक ही जगह पर कितनी देर नजर बनाये रहे क्यों कि एक जगह नजर ठहराने से तो आँखों पर भी बुरा प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है इसी लिए अब उसे कोई और जगह ढूंढनी थी जहाँ वह कुछ समय तक नजरे बनाये रहे |
                          
व्यंगकार :- श्री डॉ. वेद व्यथित जी
ब्लॉग का नाम / उसका लिक़ :- साहित्य सर्जक/
 

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