क्रोध व लोभ तो सर्व-साधारण के लिए भी जाने-माने संज्ञेय और निषेधात्मक
अवगुण हैं; भय वस्तु-स्थितिपरक अवगुण है परन्तु हास्य
...सर्वसाधारण के संज्ञान में अवगुण नहीं समझा जाता है अतः वह सबसे अधिक असत्य
दोष-उत्पत्तिकारक है |
हास्य व व्यंग्य के अत्यधिक प्रस्तुतीकरण से समाज में असत्य
की परम्परा का विकास, प्रमाणीकरण एवं प्रभावीकरण होता है जो विकृति उत्पन्न करता
है | महत्वपूर्ण विषय भी जन- सामान्य द्वारा ‘..अरे, यह तो
यूँही मजाक की बात है’ के भाव में बिना गंभीरता से लिए अमान्य कर दिया जाता है | इसलिए इस
कला का साहत्यिक-विधा के रूप में सामान्यतः एवं बहुत अधिक प्रयोग नहीं होना
चाहिए |
इसीलिये हास्य व व्यंग्य को विदूषकता व
मसखरी की कोटि में निम्न कोटि की कला व साहित्य माना जाता है |