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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

ग़ज़ल होती है... डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

          कैसी --कैसी गज़लें ---
शेर मतले का न होतो, कुंवारी ग़ज़ल होती है।
हो काफिया ही जो नहीं, बेचारी ग़ज़ल होती है।          


और भी मतले हों, हुस्ने तारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर ही मतला हो, हुस्ने-हजारी ग़ज़ल होती है।


हो रदीफ़ काफिया नहीं, नाकारी ग़ज़ल होती है,
मकता बगैर हो ग़ज़ल, वो मारी ग़ज़ल होती है।


मतला भी, मक्ता भी, रदीफ़ काफिया भी हो,
सोची, समझ के, लिख के,सुधारी ग़ज़ल होती है ।


हो बहर में, सुर ताल लय में ,प्यारी ग़ज़ल होती है,
सब कुछ हो कायदे में, वो संवारी ग़ज़ल होती है।


हर शेर एक भाव हो,  वो जारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो, वो भारी ग़ज़ल होती है।


मस्ती में कहदें झूम के, गुदाजकारी ग़ज़ल होती है,
उनसे तो जो कुछ भी कहें, मनोहारी ग़ज़ल होती है।


जो वार दूर तक करे, वो  करारी ग़ज़ल होती है,
छलनी हो दिले-आशिक, वो शिकारी ग़ज़ल होती है।


हो दर्दे-दिल की बात, दिलदारी ग़ज़ल होती है,
मिलने का करें वायदा, मुतदारी ग़ज़ल होती है।


तू गाता चल ऐ यार !  कोई कायदा न देख,
कुछ अपना ही अंदाज़ हो, खुद्दारी ग़ज़ल होती है ।


जो उस की राह में कहो, इकरारी ग़ज़ल होती है,
अंदाजे-बयाँ हो श्याम' का, वो न्यारी ग़ज़ल होती है॥



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