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शनिवार, 2 जून 2012

सरिता-संगीत.. डा श्याम गुप्त का गीत..

सरिता-संगीत   .

नदिया !

तुम कहाँ जाती हो ?
दिशाहीन , उद्देश्यहीन,
पर्वतीय नदी--झरना
गोदावरी-नासिक

कभी खिलखिलाती हुई-
उच्छ्रंख्ल बालिका की  तरह,
पत्थरों से टकराकर, उछलती हुई |
कभी गहराकर, गंभीर  समतल में -
सोचती सी बहती हुई, 
लहराती हुई |
और अंत में होजाती हो,
सागर में विलीन,
अस्तित्वहीन ||

नदिया मुस्कुराई ,
कल कल कल कल , खिलखिलाई ;
फिर लहर लहर लहराई |
यह जीवन लहरी है,
कहीं उथली ,
कहीं गहरी है |
यह जीवन धाराहै
 प्रेम प्रीति का रस न्यारा है  ||

प्रियतम की डोर बांधे,
मन को साधे ,
जीवन की ऊंची-नीची, डगर डगर-
चलते जाना ही तो जीवन है |
प्रेम की साध लिए,                                                                
प्रियतम की राह में ;                                                                  
मिलने की आस लिए,               
सरयू-अयोध्या
कावेरी- तलकाडा
चलना ही रीति है ;
यही तो प्रीति है |
सर्वस्व  लुटा देना,
अपने को भुला देना ,
अस्तित्व विहीन होकर;
प्रिय में लय कर देना ,
यह प्यार की जीत है;
यही तो प्रीति है ||

द्वारिका सागर

12 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद रीना जी.... उद्देश्यहीन.. उद्देश्य ...यह जीवन लहरी है...

      हटाएं
  2. लाजवाब रचना,बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद ..
      .यह मेरा निर्झर मन है जो,
      झर झर झर झर बहता ...

      हटाएं
  3. बहुत खूब लिखा है सुंदर रचना के लिए आभार ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद योगेन्द्र...प्राक्रतिक सन्गीत का सौन्दर्य..इस कल कल कल में...

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. धन्यवाद आशाजी...
      नदिया, सागर लय हुई,खोकर निज़ अस्तित्व।
      नदिया से सागर हुई, जग-जीवन का सत्य ।

      हटाएं

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