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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

हिन्दी की छुक छुक ....डा श्याम गुप्त.....

हिन्दी की ये रेल न जाने,
 चलते चलते क्यों रुक जाती |
जैसे  ही रफ़्तार पकडती,  
जाने क्यूं  धीमी  होजाती ||

कभी  नीति सरकारों की या, 
कभी नीति व्यापार-जगत की |
कभी रीति इसको ले डूबे , 
जनता के व्यबहार-जुगत   की ||

हिन्दी की छुक छुक

हम सब भी दैनिक कार्यों में,
 अंग्रेज़ी का पोषण करते |
अंग्रेज़ी अखबार मंगाते,  
नाविल  भी  अंग्रेज़ी पढते ||

अफसरशाही कार्यान्वन जो, 
सभी नीति का करने वाली |
सब  अंग्रेज़ी  के   कायल  हैं, 
 है अंग्रेज़ी ही पढने  वाली ||


नेताजी  लोकतंत्र क्या है,  
पढने अमेरिका  जाते हैं |
व्यापारी कैसे सेल करें,  
योरप से सीख कर आते हैं ||


यंत्रीकरण का दौर हुआ, 
फिर धीमी इसकी चाल हुई |
टीवी  बम्बैया-पिक्चर से,  
इसकी भाषा बेहाल हुई ||                                           

छुक छुक कर आगे रेल बढ़ी, 
कम्प्युटर मोबाइल आये |
पहियों की चाल रोकने को, 
अब  नए बहाने फिर आये ||

फिर चला उदारीकरण दौर,
 हम तो उदार जगभर के लिए |
दुनिया ने फिर भारत भर में,  
अंग्रेज़ी  दफ्तर खोल लिए ||

अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां है, 
सर्विस की मारा मारी है |
हर तरफ तनी है अंग्रेज़ी, 
 हिन्दी तो बस  बेचारी है ||

हम बन् क्लर्क अमरीका के,
इठलाये जग पर छाते  हैं |
उनसे ही मजदूरी लेकर,  
उन पर  ही  खूब लुटाते हैं ||

क्या इस भारत में हिन्दी की, 
मेट्रो भी कभी चल पायेगी |
या छुक छुक छुक चलने वाली ,
पेसेंजर ही  रह जायेगी ||

                                              ---- चित्र गूगल साभार ...



11 टिप्‍पणियां:

  1. हम सबके ब्लॉग पर आपने क्या खूब 'हिन्दी गान' गाया.... वाह-वाह!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद प्रतुल जी.....निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ..

      हटाएं
  2. सुन्दर हिन्दी गीत..हिन्दीदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    जवाब देंहटाएं
  3. धन्यवाद शास्त्रीजी ...आभार ...जय भारत..जय हिन्दी

    जवाब देंहटाएं
  4. हिंदी की रेल भावपूर्ण व्यंजना मूलक रचना है .कुछ भाषिक प्रयोग अखरे हैं जो लय भी भंग किये हैं -

    अफसरशाही कार्यान्वन जो,
    सभी नीति का करने वाली |

    क्रियान्वयन ,कार्यन्वित शब्द प्रयोग है -अफसरशाही किर्यान्वयन ,सभी नीति का करने वाली ....

    यंत्रीकरण का दौर हुआ,
    फिर धीमी इसकी चाल हुई |
    टीवी बम्बैया-पिक्चर से,
    इसकी भाषा बेहाल हुई || मुम्बैया फ़िल्में आज ग्लोबी स्तर पर हिंदी का प्रचार प्रसार कर रहीं हैं ,अब फिल्मों का ग्लोबल रिलीज़ होता है .शुद्धता वादियों ने ही हिंदी की रेड़ पीटी है ,स्लेंग (अपभाषा मत कहो )का अपना वजन और आकर्षण होता है श्याम गुप्त जी .

    हम बन् क्लर्क अमरीका के,
    हम बने क्लर्क अमरीका के होना चाहिए यहाँ लय की दृष्टि से

    बहर सूरत भाव और अर्थ दोनों हिंदी की रेल के लुभातें हैं और स्टेशन पे सीढ़ी लगा ,छत पे चढ़ते पैसिंजर,ध्यान बटातें हैं .
    बहुत बढ़िया प्रयोग है इन पंक्तियों में -
    क्या इस भारत में हिन्दी की,
    मेट्रो भी कभी चल पायेगी |
    या छुक छुक छुक चलने वाली ,
    पेसेंजर ही रह जायेगी ||
    बधाई इस रचना के लिए हिंदी दिवस पर इक समर्पित हिंदी सेवी को .

    शनिवार, 15 सितम्बर 2012
    सज़ा इन रहजनों को मिलनी चाहिए

    जवाब देंहटाएं
  5. सच है जिंदगी की रेल अपने आप चलते चलते रुक जाती है |बहुत भाव पूर्ण रचना |
    आशा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद ..आशाजी ..
      -----बात ज़िंदगी की रेल की नहीं ....हिन्दी की रेल की है ..जिसे रोकने को बार बार नए-नए कृत्य सामने आजाते हैं ...

      हटाएं
  6. जब हिंदी भाषी ...अपनी हिंदी को गालियाँ देंगे तो आने वाला समय कैसा होगा ...भगवान ही मालिक है

    जवाब देंहटाएं

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