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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

श्याम मधुशाला .... डा श्याम गुप्त



 
शराव पीने से बड़ी मस्ती सी छाती है ,
सारी दुनिया रंगीन नज़र आती है
बड़े फख्र से कहते हैं वो ,जो पीता ही नहीं ,
जीना क्या जाने ,जिंदगी वो जीता ही नहीं ।।
 
पर जब घूँट से पेट में जाकर ,
सुरा रक्त में लहराती
तन के रोम-रोम पर जब ,
भरपूर असर है दिखलाती
 
होजाता है मस्त स्वयं में ,
तब मदिरा पीने वाला
चढ़ता है उस पर खुमार ,
जब गले में ढलती है हाला।
 
हमने ऐसे लोग भी देखे ,
कभी देखी मधुशाला।
सुख से स्वस्थ जिंदगी जीते ,
कहाँ जिए पीने वाला।

क्या जीना पीने वाले का,
जग का है देखा भाला।
जीते जाएँ मर मर कर,
पीते जाएँ भर भर हाला।

घूँट में कडुवाहट भरती है,
सीने में उठती ज्वाला ।
पीने वाला क्यों पीता है,
समझ न सकी स्वयं हाला ।

पहली बार जो पीता है ,तो,
लगती है कडुवी हाला ।
संगी साथी जो हें शराबी ,
कहते स्वाद है मतवाला ।

देशी, ठर्रा और विदेशी,रम-
 
व्हिस्की, जिन का प्याला।
सुंदर-सुंदर सजी बोतलें ,
ललचाये  पीने  वाला।

स्वाद की क्षमता घट जाती है ,
मुख में स्वाद नहीं रहता ।
कडुवा हो या तेज कसैला ,
पता नहीं चलने वाला।

बस आदत सी पड़ जाती है ,
नहीं मिले उलझन होती।
बार बार,फ़िर फ़िर पीने को ,
मचले फ़िर पीने वाला।

पीते पीते पेट में अल्सर ,
फेल जिगर को कर डाला।
अंग अंग में रच बस जाए,
बदन खोखला कर डाला। 

निर्णय क्षमता खो जाती है,
हाथ पाँव कम्पन करते।
भला ड्राइविंग कैसे होगी,
नस नस में बहती हाला।

दुर्घटना कर बेठे पीकर,
कैसे घर जाए पाला।
पत्नी सदा रही चिल्लाती ,
क्यों घर ले आए हाला।

बच्चे भी जो पीना सीखें ,
सोचो क्या होनेवाला, ।
गली गली में सब पहचानें ,
ये जाता पीने वाला।

जाम पे जाम शराबी पीता ,
साकी डालता जा हाला।
घर के कपड़े बर्तन गिरवी ,
रख आया हिम्मत वाला।

नौकर सेवक मालिक मुंशी ,
नर-नारी हों हम प्याला,
रिश्ते नाते टूट जायं सब,
मर्यादा को धो डाला।


पार्टी में तो बड़ी शान से ,
नांचें पी पी कर हाला ।
पति-पत्नी घर आकर लड़ते,
झगडा करवाती हाला।

झूम झूम कर चला शरावी ,
भरी गले तक है हाला ।
डगमग डगमग चला सड़क पर ,
दिखे न गड्डा या नाला ।

गिरा लड़खडाकर नाली में ,
कीचड ने मुंह भर डाला।
मेरा घर है कहाँ ,पूछता,
बोल न पाये मतवाला।

जेब में पैसे भरे टनाटन ,
तब देता साकी प्याला ।
पास नहीं अब फूटी कौडी ,
कैसे अब पाये हाला।

संगी साथी नहीं पूछते ,
क़र्ज़ नहीं देता लाला।
हाथ पाँव भी साथ न देते ,
हाला ने क्या कर डाला।

 
लस्सी दूध का सेवन करते ,
खस केसर खुशबू वाला।
भज़न कीर्तन में जो रमते ,
राम नाम की जपते माला।

पुरखे कहते कभी न करना ,
कोई नशा न चखना हाला।
बन मतवाला प्रभु चरणों का,
राम नाम का पीलो प्याला।

मन्दिर-मस्जिद सच्चाई पर,
चलने की हैं राह बताते।
और लड़ खडा कर नाली की ,
राह दिखाती मधुशाला।

मन ही मन हैं सोच रहे अब,
श्याम' क्या हमने कर डाला।
क्यों हमने चखली यह हाला ,
क्यों जा बैठे मधुशाला॥




14 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद धीरेन्द्र जी .... लस्सी-ढूध का सेवन आनंददायक हो......

      हटाएं
  2. देशी हो या हो विदेशी, दारू तो है एक जहर |
    जन-जीवन ये बिखर है जाता, साँसे जाती हैं ठहर ||

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (12-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद प्रदीप जी ..... जहर पीने की ठानी है,नक़ल की मनमानी है

      हटाएं
  3. पीते पीते पेट में अल्सर ,
    फेल जिगर को कर डाला।
    अंग अंग में रच बस जाए,
    बदन खोखला कर डाला।
    sara aanad hi khatam kar diya aapne madirapan ka.सार्थक भावपूर्ण अभिव्यक्ति बधाई भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं

    जवाब देंहटाएं
  4. sundar prastuti, "pi lepi le ji bhar pyala,kah tu bs hala hala ,subah sham bhuke bhi to kya, nam tumhara saki ho,aur tumhara ghar madhushala,must raho almast bhajan me,kaho ram mat, kah madhushala..."

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद मधु जी ....
      घर मधुशाला, जप मधुबाला, जय जय हाला,
      देखेंगे सोचेंगे जब यह हाला ने क्या कर डाला।

      हटाएं
  5. पीते पीते पेट में अल्सर ,
    फेल जिगर को कर डाला।
    अंग अंग में रच बस जाए,
    बदन खोखला कर डाला।

    बहुत ही उम्दा रचना रची है आपने श्याम जी
    आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा ..अगर आपको भी अच्छा लगे तो मेरे ब्लॉग से भी जुड़े।
     बेतुकी खुशियाँ
    आभार!!

    जवाब देंहटाएं
  6. बढ़िया सन्देश परक रचना -सेहत करती चौपट निसि दिन ,साकी ये तेरी हाला ,यकृत से होकर जायेगी ,मय ,तेरी मदिरा ,हाला .

    जवाब देंहटाएं
  7. धन्यवाद अरुण जी ......ये खस-केसर वाले लस्सी-दूध की मस्ती है ....राम नाम की मस्ती है...

    जवाब देंहटाएं

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