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शनिवार, 17 नवंबर 2012

श्याम स्मृति- ..असत्य की उत्पत्ति ..एवं हास्य ...ड़ा श्याम गुप्त...




       असत्य की उत्पत्ति के चार मूल कारण हैं क्रोध, लोभ, भय एवं हास्य | वास्तव में तो मानव का अंतःकरण असत्य कथन एवं वाचन नहीं करना चाहता परन्तु इन चारों के आवेग में वायवीय मन बहने लगता है और सत्य छुप जाता है |
       क्रोध व लोभ तो सर्व-साधारण के लिए भी जाने-माने संज्ञेय और निषेधात्मक अवगुण हैं; भय वस्तु-स्थितिपरक अवगुण है परन्तु हास्य ...सर्वसाधारण के संज्ञान में अवगुण नहीं समझा जाता है अतः वह सबसे अधिक असत्य दोष-उत्पत्तिकारक है |
        हास्य व व्यंग्य के अत्यधिक प्रस्तुतीकरण से समाज में असत्य की परम्परा का विकास, प्रमाणीकरण एवं प्रभावीकरण होता है जो विकृति उत्पन्न करता है | महत्वपूर्ण विषय भी जन- सामान्य द्वारा  ‘..अरे, यह तो यूँही मजाक की बात है के भाव में बिना गंभीरता से लिए अमान्य कर दिया जाता है | इसलिए इस कला का साहत्यिक-विधा के रूप में सामान्यतः एवं  बहुत अधिक प्रयोग नहीं होना चाहिए
        इसीलिये हास्य व व्यंग्य को विदूषकता व मसखरी की कोटि में निम्न कोटि की कला व साहित्य माना जाता है |

2 टिप्‍पणियां:


  1. हास्य व व्यंग्य के अत्यधिक प्रस्तुतिकरण से समाज में असत्य की परम्परा का विकास, प्रमाणीकरण एवं प्रभावीकरण होता है जो विकृति उत्पन्न करता है |
    …अवश्य ही यह गुनाह मंचों पर चुटकलेबाज़ हास्य कविता के नाम पर व्यापक पैमाने पर कर रहे हैं ।

    डॉ. श्याम गुप्त जी
    साधुवाद इस संक्षिप्त लेख के लिए ।
    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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