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    2 माह पहले

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

नव गीतिका

नव गीतिका


दिल किरच किरच टूटे

दिल किरच किरच टूटे और टूटता ही जाये
बाक़ी बचे न कुछ भी फिर भी धडकता जाये
कहने को साँस चलती रहती है खुद ब खुद ही
ये ही नही है काफी बस साँस चलती जाये
मौसम की बात छोडो अब खेत ही कहाँ हैं
खेतों में खूब जंगल लोहे का बनता जाये
तड़पन को कौन पूछे कितना भी दिल तडप ले
जब तक चले हैं सांसे बेशक तडपता जाये
ये भी हर भरा था जो ठूंठ सा खड़ा है
किस को पडी है बेशक मिट्टी में मिलता जाये
पाया नही जो चाहा अनचाहा खूब पाया
दुनिया में कब हुआ है जो चाहें मिलता जाये
अब बहुत हो चुका है सूरज का तमतमाना
अब तो गरज के बदरा रिमझिम बरसता जाये |




32 टिप्‍पणियां:

  1. कल 22/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल '' तेरी गाथा तेरा नाम '' पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है !

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  2. अब बहुत हो चुका है सूरज का तमतमाना
    अब तो गरज के बदरा रिमझिम बरसता जाये |
    नव तराने सा सुन्दर है यह नवगीत .

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर कविता ! अशांत जीवन की शांति कहाँ ?
    www.gorakhnathbalaji.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. bhai swai singh ji is ke liye aap hi to uttrdayi hain ydi aap mujhe yhan n late to bhla yh sb kaise smbhv hai main is ka smpoon shrey aap ko hi deta hoon
      ise swikar kren

      हटाएं
  5. कंक्रीट के जंगलों में ...कहाँ छाँव ढूँढ़ते हो ....यह वोह शै है जो हम खुद ही गवां बैठे ! भावपूर्ण रचना !!

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर सृजन , प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

    जवाब देंहटाएं
  7. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

    जवाब देंहटाएं

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