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    5 सप्ताह पहले

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

ग़ज़ल की गज़ल... डा श्याम गुप्त....


       . ग़ज़ल होती है --       
शेर मतले का रहे , तो ग़ज़ल होती है ।
शेर मक्ते का रहे,  तो ग़ज़ल होती है ।

रदीफ़ औ काफिया रहे,तो ग़ज़ल होती है ,
बहर हो सुर ताल लय हो,वो ग़ज़ल होती है।

पाँच से ज्यादा हों शेर, तो ग़ज़ल होती है ,
बात खाशो-आम की हो, वो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल की क्या बात यारो, वह तो ग़ज़ल होती है ,
ग़ज़ल की हो बात जिसमें, वो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल कहने का भी इक अंदाजे ख़ास होता है,
कहने का अंदाज़ जुदा हो, तो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल तो बस इक अंदाजे -बयाँ  है श्याम ,
श्याम' तो जो कहदें,  वो ग़ज़ल होती  है॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...................

    गज़ल भी ज्ञान भी..............
    लाजवाब....

    शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. ग़ज़ल तो बस इक अंदाजे -बयाँ है श्याम ,
    श्याम' तो जो कह दें, वो ग़ज़ल होती है॥

    ...वाह, वाह!...क्या बात है!

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. धन्यवाद चन्द्रभूषण जी....सही कहा....

      उल्फ़त होती है तो गज़ल होती है।
      वरना हर कविता सजल होती है।

      हटाएं

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