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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

यह रचना गजल नही है
 क्यों कि जैसे हिंदी में दोहा छंद के लिए एक निश्चित वर्ण चाहिए 
उसी प्रकार गजल के लिए भी बहर मुकर्र (निश्चित} हैं 
जैसे छंद भंग होने से दोहा नही कहा जा सकता वैसे ही हम बहर के बिना गजल किसी भी रचना को कैसे कह सकते हैं 
बहर के साथ ही 
देवनागरी में वर्ण की गिनती के नियम भी अलग प्रकार से हैं जो उर्दू में लागू नही होते 
इस लिए इस प्रकार की रचनाये नव गीतिका हैं 
क्यों कि गीत की लम्बी परम्परा यहाँ उपस्थित है गीतिका हरी गीतिका और नव गीतिका आदि जो गीत की परम्परा को आगे बढ़ती है कुछ ऐसी ही नव गीतिकाएं यहाँ प्रस्तुत करने का साहस कर रहा हूँ 
नव गीतिकाएं 
झूठ के आवरण सब बिखरते रहे 
साँच की आंच से वे पिघलते रहे  
खूब ऊँचे बनाये थे चाहे महल 
नींव के बिन महल वे बिखरते रहे 
हाथ आता कहाँ चाँद उन को  यहाँ 
मन ही मन में वे चाहे मचलते रहे 
ओस की बूँद ज्यों २ गिरी फूल पर 
फूल खिलते रहे और महकते रहे 
जैसे २ बढ़ी खुद से खुद दूरियां 
नैन और नक्श उन के निखरते रहे 
देख लीं खूब दुनिया की रंगीनियाँ 
रात ढलती रही दीप बुझते रहे 
हम जहाँ से चले लौट आये वहीं 
जिन्दगी भर मगर खूब चलते रहे ||

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति,..प्रभावी रचना,..वेद जी

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही खुबसूरत और कोमल भावो की अभिवयक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. bhai swaai singh ji aap ka pyar yhan se jane nhi de rha vrna chlo un ki apni soch hai iishwr un ka bhi bhla kre
      aap ka aabhar vykt krta hoon swikar kren

      हटाएं
  4. बहुत ही ख़ूबसूरत और भावमयी रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. bndhu aap ne is rchna ke upr mera likhe huye mntvy smbhvt: dhyan nhi diya hai isi liye aap ise gzl kah rhe hain yh spsht: nv gitika hai ya hr rchna ko gzl khne kii yhan ksm khai hui hai
      ydi aap ise gzl kh rhe hain to is kii bahar btaayen v us ka rooz btayen anytha ise nv gitika hi mane

      हटाएं
  6. बिलकुल नए अंदाज़ में...स्वाभाविक रचना !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. aap ka bdppn hai jo aap ne meri baat pr dhyan diya hai aabhar vykt krta hoon kripya swikar kren

      हटाएं
  7. भाई जी, ये बहर व रूज़ बताने जैसी बेवकूफ़ी में हम नहीं पडते...जो गज़ल है..है....आप जो चाहें मानें कौन रोकने जा रहा है...
    ---सब कविता है...सब कविता है....गाता चल..गुनुगुनाता चल...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बन्धुवर डा. श्याम गुप्त जी
      आप बार बार इस प्रकार प्रतिकिरिया देते है आप से एक बार फिर से निवेदन है की आप आगे इस टिप्पणी नहीं दे.

      हटाएं
    2. बिल्कुल सही है एसी टिप्पणी नही होनी चाहिये......क्रिया की प्रतिक्रिया होती है...किसी से नियमों की जानकारी जैसी बातें पूछने का कोई अर्थ नहीं...

      हटाएं

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