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सोमवार, 30 अप्रैल 2012

चन्दा -चकोर....... डा श्याम गुप्त



चकोर !
तू क्यों निहारता रहता है 
चाँद की ओर ?
वह दूर है
अप्राप्य है ,
फिर भी क्यों साधे है
मन की डोर !

प्रीति में है बड़ी गहराई 
प्रियतम की आस, जब-
 मन में समाई;
दूर हो या पास
मन लेता है अंगडाई ।
प्रेमी-प्रेमिका तो,
नयनों में ही बात करते हैं,
इक दूजे की आहों में ही 
बस रहते हैं,
इसी को तो प्यार कहते हैं ।

मिलकर तो सभी प्यार कर लेते हैं ,
जो दूर से ही रूप-रस पीते हैं -
वही तो अमर-प्रेम जीते हैं ।।                      (--प्रेम काव्य, महाकाव्य से )

12 टिप्‍पणियां:

  1. जो दूर से ही रूप-रस पीते हैं -
    वही तो अमर-प्रेम जीते हैं ।।

    बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन रचना

    MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

    जवाब देंहटाएं
  2. शोभा चर्चा-मंच की, बढ़ा रहे हैं आप |
    प्रस्तुति अपनी देखिये, करे संग आलाप ||

    मंगलवारीय चर्चामंच ||

    charchamanch.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन रचना

    जवाब देंहटाएं
  4. मेरी जीवन रेखा और भाग्य रेखा एक है मेरी लाइफ कैसी होगी कृपया मार्गदर्सन करे. मेरी उम्र ३० साल है . कृपया ९६५४०९६३०९ पर संपर्क करे .

    जवाब देंहटाएं
  5. मेरी जीवन रेखा और भाग्य रेखा एक है मेरी लाइफ कैसी होगी कृपया मार्गदर्सन करे. मेरी उम्र ३० साल है . कृपया ९६५४०९६३०९ पर संपर्क करे .

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