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गुरुवार, 3 मई 2012

(अ) सृष्टि व ब्रह्मांड…आधुनिक विज्ञान का मत....डा श्याम गुप्त...




                     (अ) सृष्टि व ब्रह्मांड…

भाग १: आधुनिक विज्ञान  का मत....

                  जिस दिन मानव ने ज्ञान का फ़ल चखा,उसने मायावश होकर प्रकृति के विभिन्न रूपों को भय, रोमांच, आश्चर्य व कौतूहल से देखा और उसी क्षण मानव के मन में ईश्वर, गाड, रचयिता, खुदा, कर्ता का आविर्भाव हुआ। उसकी खोज के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मांड, सृष्टि व जीवन की उत्पत्ति का रहस्य जानना प्रत्येक मस्तिष्क का लक्ष्य बन गया। इसी उद्देश्य यात्रा में मानव की क्रमिक भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक व दार्शनिक उन्नति के आविर्भाव की गाथा है। आधुनिक --विज्ञान हो या दर्शन या पुरा-वैदिक - विज्ञान इसी यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही सबका का चरम लक्ष्य है।

                           आधुनिक विज्ञान  की मान्यता के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति का मूल "बिग-बैंग सिद्धांत" है। प्रारंभ में ब्रह्माण्ड एकात्मकता स्थिति (सिंगुलारिटी) में, शून्य आकार व अनंत ताप रूप (infinite hot ) था। ...फ़िर....
                
१- अचानक उसमें एक विष्फोट हुआ ---बिग-बैंग , और १/१०० सेकंड में तापक्रम सौ बिलियन सेंटीग्रेड हो गया। उपस्थित स्वतंत्र घनीभूत -ऊर्जा व विकिरण के मुक्त होने से ..आदि--ऊर्ज़ा के असंख्य उप-कण उत्पन्न होकर अनंत ताप के कारण एक दूसरे से बिखंडित होकर तीब्रता से दूर होने लगे। ये सब  ये हल्के, भार-रहित, विद्युतमय व उदासीन आदि ऊर्ज़ा उपकण थे जो मूलतः-- इलेक्ट्रोन, पोज़िट्रान, व न्‍यूट्रान थे । जो शून्य भार, शून्य चार्ज थे एवं फ्री-ऊर्जा से लगातार बनते जा रहे थे।
ये एटम-पूर्व कण थे सभी कण बराबर संख्या में थे एवम् उपस्थित स्वतन्त्र ऊर्ज़ा से लगातार बनते जा रहे थे। इस प्रकार एक "कोस्मिक-सूप" बन कर तैयार हुआ।
२- एनिहिलेसन (सान्द्रीकरण) स्टेज-- कणों के लगातार एक दूसरे से दूर जाने से तापमान कम होने पर हल्के कण एक दूसरे से जुड कर भारी कण बनाने लगे जो १००० मिलियन : १ के अनुपात से बने। वे मुख्यतया इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, न्‍युट्रोन व फोटोन (प्रकाश कण) थे(जो -१००० मिलियन एलेक्ट्रोन्स या फ़ोटोन्स या पोज़िट्रोन्स या न्यूट्रीनोस=१ प्रोटोन या न्यूट्रोन के अनुपात में बने) । ये ऎटम- पूर्व कण बने जो लगातार बन रहे थे एवम उपस्थित ऊर्ज़ा से नये उप-कण उत्पन्न भी हो रहे थे, तापमान लगातार गिरने से बनने की प्रक्रिया धीमी थी।  साथ ही भारी मात्रा में स्वतंत्र ऊर्जा भी उपस्थित थी।
३- स्वतंत्र केन्द्रक (न्युक्लिअस)-- १४ वे सेकंड में तीब्र एनिहिलाशन (सान्द्री करण) से काम्प्लेक्स न्युक्लिअस के बनने पर  -१ प्रोटोन व १ न्युत्रोन से हाइड्रोजन व २ प्रो टन + २ न्युत्रोन से हीलियम के अणु पूर्व कण बनने लगे।

४- बिग बेन्ग के तीन मिनट के अन्त में- -शेष हलके कण, न्‍यूट्रान्‍स, प्रति-न्यूट्रान्‍स, लघु केन्द्रक कण के साथ ही ७३% हाइड्रोजन व २७ % हीलियम मौजूद थे।  कोई एलेक्ट्रान शेष नहीं थे। इस समय आदि-कण बनने की प्रक्रिया धीमी होने पर स्वतन्त्र ऊर्ज़ा के व एलेक्ट्रोन्स आदि के न होने से आगे की विकास प्रक्रिया लाखों वर्षों तक रूकी रही। यद्यपि कणों के तेजी से एक दूसरे से दूर जाने पर यह पदार्थ- कोस्मिक-सूप-कम घना होता जारहा था, अतः उपस्थित गेसों की एकत्रीकरण (क्लम्पिन्ग) क्रिया प्रारम्भ होचली थी, जिससे बाद में गैलेक्सी व तारे आदि बनने लगे... अतः ठंडे होने की प्रक्रिया लाखों सालों तक रुकी रही।  हाँ उपस्थित कणों के एकत्रीकरण (क्लाम्पिंग) की प्रक्रिया से गेलेक्सी (आकाश गंगाएं) व तारे आदि बनने की प्रक्रिया  प्रारम्‍भ हो गयी थी।
 ५- लाखों वर्षों बाद ताप बहुत अधिक कम होने से बहुत अधिक ठंडा होने पर   पुनः ऊर्जा के निसृत होने पर प्रोटोन न्युक्लियस के साथ मिलकर केन्द्र में स्थित होने पर न्‍यूट्रान्‍स उसके चारों और एकत्र होगये एवं प्रथम परमाणु (एटम) का निर्माण हुआ जो हाइड्रोजन व हीलियम गैस बने। ये एटम ऊर्जा के साथ भारी पदार्थ व गेलेक्शी बनाने लगे। इस प्रकार भारी पदार्थ, हीलियम, हाइड्रोजन, हलके-कण व ऊर्जा मिलकर विभिन्न पदार्थ बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

    -
न्यूट्रिनो +एंटी-न्यूट्रिनो + चार्जड भारी इलेक्ट्रोन = ठोस पदार्थ ( सोलिड्स), तारे, ग्रह ,पिंड  आदि।
    -बाकी एलेक्ट्रोन + पोजित्रोन + ऊर्जा = तरल पदार्थ ( लिक्विड) ,जल आदि
   -
फोटोन ( प्रकाश कण ) + बाकी ऊर्जा = कम घनत्व के पदार्थ- नेबुला, गैलेक्सी आदि
            इस प्रकार सारा ब्रह्माण्ड बनता चला गया। विभिन्न अणुओं से विभिन्न समस्त पदार्थ बने।
 
पुनः एकात्मकता- क्योंकि प्रत्‍येक कण एक दूसरे से लगातार दूर होता जा रहा है, अतः ब्रह्माण्ड  अत्यधिक ठंडा होने पर, कणों के मध्य आपसी आकर्षण समाप्त होने पर, कण पुनः एक दूसरे से विश्रंखलित होकर अपने स्वयं के रूप में आने लगते हैं एवं पदार्थ विलय होकर पुनः ऊर्जा व आदि कणों में संघनित होकर, ब्रह्माण्ड एकात्मकता को प्राप्त होता है, पुनः नए बिगबैंग के लिए, नई सृष्टि के क्रम के लिए।

सम स्थिति सिद्धांत -- विज्ञान के इस एक अन्य सिद्दान्त के अनुसार, ब्रह्मांड जैसा आज है सदैव वही रहता है, जैसे -जैसे कण एक दूसरे से दूर होते हैं नया पदार्थ उन के बीच के स्थान को भरता जाता है, तारों, गैलेक्सियों आदि के बीच भी, यही प्रक्रिया चलती रहती है।

सन्दर्भ --
१. ओरिजिन एन्ड फ़ेट ओफ़ यूनिवर्स--स्टीफ़न हाकिन्स 
२. अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम ...स्टीफन हाकिंस 
3.सृष्टि महाकाव्य ( ईशत इच्छा या बिग-बेंग -एक अनुत्तरित उत्तर ) ..डा श्याम गुप्त   









6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया!
    --
    आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. ज्ञानवर्धक जानकारी, और जटिल विषय की सरल प्रस्तुति
    बहुत बहुत आभार!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद सुग्य जी....पधारने हेतु आभार...

    उत्तर देंहटाएं

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