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बुधवार, 6 जून 2012

चातक बिरहा ....डा श्याम गुप्त...


हे चातक !
तुम क्यों बिरहा गाते हो ?
धरती के जल से-
प्यास नहीं बुझाते हो |
हे, उच्चकुल प्रतिमान !
स्वाति- बूँद के हेतु,
प्यासे रह जाते हो ,
सब दुःख सह जाते हो ||

पपीहे ने आसमान में चक्कर लगाया,   
टेर लगाकर बिरहा गाया |
प्रेम, परीक्षा लेता है,
प्रेम, परीक्षा देता है ;
सच्चा प्रेम तो-
किसी एक से ही होता है |
प्रेमी तो,
त्याग तप साधना से ही 
अमर-प्रेम जीता है |
तभी तो चातक,
स्वाति -बूँद रूपी -
सच्चा प्रेम-रस ही पीता है ||

सच्चा प्रेमी तो,
बिरहा गाते हुए भी-
सारा जीवन जी लेता है |
चातक,
सौभाग्यशाली है कि-
स्वाति-बूँद का ,
रूप-रस तो पी लेता है ||

6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. हे चातक !
      तुम क्यों बिरहा गाते हो ?
      धरती के जल से-
      प्यास नहीं बुझाते हो |
      हे, उच्चकुल प्रतिमान !
      स्वाति- बूँद के हेतु,
      प्यासे रह जाते हो ,
      सब दुःख सह जाते हो ||

      बहुत खूब ...

      हटाएं
  2. धन्यवाद धीरेन्द्र जी व सबाई सिंह जी...

    उत्तर देंहटाएं

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