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शुक्रवार, 8 मार्च 2013

विदेशी विचार की उपज महिला दिवस पर एक कविता प्रस्तुत कर  रहा हूँ 
भारतीय संस्कृति में इकार के बिना शिव भी शव हो जाता है शिव ही सृष्टि की निर्मात्री है और डिवॉन की भी पूज्य है । 



     



नही हारोगी तुम 

मैं कैसे मान लूं कि 
तुम इतनी जल्दी हार जाओगी 
क्योंकि मैं जानता  हूँ 
तुम्हारा  संघर्ष ,तुम्हारा जीवट  ,
तुम्हारी अन्तस् की तीव्र आंधी 
मैंने घोर गर्जन के साथ 
तुम्हारी तडित कौंध को देखा है 
मूसलाधार वृष्टि से अधिक 
तुम्हारे आसुंओं की बाढ़  से 
मैंने बहुत कुछ उजड़ते देखा है 
तुम्हारे  भयंकर ताप   से 
 बहुत कुछ झुलसने पर 
उस का ताप अनुभव किया है 
और बर्फ सी सर्द हो कर 
जमते पिघले और गलते देखा है  तुम्हें  ।
तब कैसे मान लूं कि  
तुम हार जाओगी इतनी जल्दी 
नहीं यह विश्वसनीय नहीं  है 
क्योंकि सूरज नहीं  उगता रात में 
या तारे नहीं  चमकते हैं दिन में 
यदि ऐसा हो गया तो लगेगा तुम हार गईं 
परन्तु ऐसा हुआ तो 
अनर्थ हो जायेगा 
सब कुछ समाप्त हो जायेगा 
मिट जायेगा सब कुछ ।
बेशक गर्जना , बिजली सी तडकना 
आग सा झुलसना 
या बर्फ सी सर्द हो कर 
गलना भी पड़े तुम्हें 
परन्तु हारना नहीं  
सोचना भी मत ऐसा 
क्योंकि तुम हारोगी ही  नहीं 
कभी नहीं  कदापि नहीं  ।।

2 टिप्‍पणियां:

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